Ambala: 44 किलो अफीम मामले में आरोपी अली हुसैन को कोर्ट से राहत, सबूतों के अभाव में बरी

On: September 11, 2026 4:55 PM
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Ambala: Accused Ali Hussain Acquitted in 44 kg Opium Case Due to Lack of Evidence
Ambala: Accused Ali Hussain Acquitted in 44 kg Opium Case Due to Lack of Evidence

हरियाणा के Ambala में एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक पुराने मामले में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी अली हुसैन उर्फ नारू को बरी कर दिया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार बंसल की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और स्वीकार्य साक्ष्य पेश करने में सफल नहीं हो पाया, जिसके चलते उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया।Ambala

यह मामला करीब 16 साल पुराना है, जिसकी सुनवाई लंबे समय से अदालत में चल रही थी। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि आरोपी के खिलाफ केवल सह-आरोपियों के बयान ही आधार बने हुए थे, जो कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं माने जा सकते।

मामला कैसे सामने आया ?

जानकारी के अनुसार यह घटना 22 मार्च 2009 की है। उस दिन अंबाला सिटी पुलिस ने सिविल अस्पताल के पास नाकाबंदी कर रखी थी। इसी दौरान पुलिस ने एक संदिग्ध कार को रोककर तलाशी ली। तलाशी के दौरान कार से करीब 44 किलोग्राम अफीम बरामद की गई थी। यह बरामदगी एनडीपीएस एक्ट के तहत एक गंभीर अपराध माना गया, जिसके बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए कार में मौजूद तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान आशुतोष उर्फ लकी, गुरमीत सिंह और बलजीत सिंह उर्फ कालू के रूप में हुई थी। पुलिस ने इन तीनों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू की। बाद में अदालत में सुनवाई के दौरान वर्ष 2011 में इन तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई थी।Ambala

जांच में सामने आया अली हुसैन का नाम ?

पुलिस जांच के दौरान गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ की गई थी। पूछताछ में आरोपियों ने अपने बयान में राजस्थान के जालवाड़ निवासी अली हुसैन उर्फ नारू का नाम लिया था। आरोपियों ने दावा किया था कि इस मामले में अली हुसैन की भी भूमिका है और उसने कथित तौर पर साजिश रची थी।

इसी आधार पर पुलिस ने अली हुसैन के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया और उसे इस मामले में आरोपी बनाया गया। हालांकि जांच के दौरान पुलिस अली हुसैन के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य जुटाने में सफल नहीं हो पाई। न तो उसके पास से कोई बरामदगी हुई और न ही उसके खिलाफ ऐसा कोई ठोस दस्तावेजी सबूत सामने आया जो उसे सीधे तौर पर इस मामले से जोड़ सके।

अदालत ने क्या कहा ?

मामले की सुनवाई के दौरान अली हुसैन के वकील ने अदालत में दलील दी कि अभियोजन पक्ष के पास उनके मुवक्किल को आरोपी साबित करने के लिए केवल सह-आरोपियों के पुराने स्वीकारोक्ति बयान ही मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए ऐसे बयान कानून के अनुसार तब तक साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होते, जब तक कि उनकी मदद से कोई ठोस बरामदगी न हुई हो।

अदालत ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए सह-आरोपियों के बयान मात्र के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि जांच एजेंसियां आरोपी अली हुसैन और पहले से दोषी ठहराए गए अन्य आरोपियों के बीच किसी प्रकार का कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) या पैसों के लेन-देन का कोई प्रमाण अदालत में पेश नहीं कर सकीं। ऐसे में यह साबित नहीं हो पाया कि अली हुसैन इस कथित साजिश में शामिल था या उसने अफीम की आपूर्ति की थी।

अदालत ने कहा कि जब तक किसी आरोपी के खिलाफ पुख्ता और भरोसेमंद साक्ष्य मौजूद न हों, तब तक उसे दोषी ठहराना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। इसी आधार पर अदालत ने अली हुसैन को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश सुनाया।

इस फैसले के साथ ही करीब डेढ़ दशक पुराने इस मामले में अली हुसैन को बड़ी कानूनी राहत मिल गई। अदालत के इस निर्णय को न्यायिक प्रक्रिया में सबूतों की अहमियत और कानूनी सिद्धांतों के पालन के रूप में भी देखा जा रहा है।

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Best24News के संस्थापक (Founder) हैं और पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के साथ काम करते हुए सामाजिक, प्रशासनिक और जमीनी स्तर की खबरों को प्रमुखता से कवर किया है। Best24News के माध्यम से ताजा और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुंचा रहे हैं।

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