
धारूहेड़ा: देशभर में गुरूवार को करवा चौथ पर्व हषोंल्लास से मनाया गया। रात को महिलाओं ने चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला । सुबह घरों में पूजा अर्चना करके पूरे दिन व्रत रखा गया। क्योकि हिंदू धर्म में सूर्य और चंद्रमा को देवस्वरूप माना गया है। पूजा-पाठ में जल अर्पित करने की परंपरा का विशेष महत्व है। करवाचौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देना व्रत की प्रमुख विधि में से एक माना जाता है।

धारूहेड़ा में करवा चौध पर्व मनाया, चंद्र को सूर्य को दिया अर्घ्य
जानिए क्या करवा चौथ की परमपरा: बता दे कि आत के दिन यानि महिलाएं करवा चौथ पर अपने पति की लंबी उम्र और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन सुबह से शाम तक बिना पानी पिए व्रत किया जाता है। शाम को सोलह श्रृंगार करके माता करवा और भगवान शिव-पार्वती की पूजा की जाती है, फिर चंद्रमा के निकलने का इंतजार किया जाता है।चंद्रमा को देखकर अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है, इसलिए अर्घ्य का नियम सबसे अहम माना जाता है।
ये नियम भी जानें: मान्यता है कि अर्घ्य देते समय जल की धारा या छींटें पैरों पर नहीं पड़नी चाहिए। इसके पीछे धार्मिक कारण है। चंद्रमा को देवता माना गया है और अर्घ्य का जल पवित्र होता है। पैरों पर जल पड़ना देवता का अपमान माना जाता है, जिससे व्रत का पूरा फल नहीं मिलता। साथ ही पैरों पर जल पड़ने से व्रत की शुद्धता भी भंग होती है।
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धारूहेड़ा में करवा चौध पर्व मनाया, चंद्र को सूर्य को दिया अर्घ्य
करवा चौथ व्रत कथा-वीरावती की कहानी (Karwa Chauth Ki Kahani)
एक समय की बात है एक साहूकार के सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम वीरावती था। 7 भाइयों की अकेली बहन होने की वजह से वीरावती सभी भाइयों को अत्यंत प्रिय थी। एक बार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को साहूकार की पत्नी समेत उसकी सातों बहुओं और पुत्री ने भी करवा चौथ का व्रत रखा। पूरे दिन उपवास करने की वजह से भाइयों की एकलौती बहन वीरावती व्याकुल हो रही थी।
व्रत की पवित्रता: हमेशा ऊंची जगह से या थाली में अर्घ्य दें और ध्यान रखें कि जल जमीन पर गिरे, पैरों पर नहीं। साफ मन और सही विधि से किया गया व्रत ही सुख और सौभाग्य लाता है। चलिए हम आपको बताते हैं कि वो कौन सी एक गलती है, जो चंद्रमा को अर्घ्य देते वक्त अमूमन महिलाओं से हो जाती है और जिससे व्रत की पवित्रता भी नष्ट हो सकती है।
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