Jagannath Rath Yatra History: भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भारत के सबसे प्राचीन और भव्य धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। हर साल यानि आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन ओडिशा के पुरी से यात्रा निकाली जाती है। यह यात्रा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र होती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विशाल रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर तक जाते हैं। इस यात्रा में शामिल होकर रथ खींचना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

5,000 साल पुराना है इतिहास
बता दें कि उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाले इस महा-उत्सव का इतिहास लगभग 5,000 साल पुराना माना जाता है। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और पद्म पुराण में भी इस दिव्य यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। सबसे अहम बात यहै कि एक समय था यह यात्रा केवल उडीसा तक ही सीमित थी। लेकिन आजकल धार्मिक आस्था के चलते हरियाणा में भी हर शहर में भगवान जगन्नाथ ट्रस्ट बनती जा रही है तो हर शहर में इसी आस्था को लेकर जगन्नाथ यात्रा निकाली जा रही है।
जानिए रथ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?
बहन सुभद्रा की नगर भ्रमण की इच्छा: सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण की छोटी बहन सुभद्रा ने अपने भाइयों (श्रीकृष्ण और बलराम) से नगर देखने और द्वारका भ्रमण करने की इच्छा जताई। तब भगवान कृष्ण और बलराम ने सुभद्रा को एक भव्य रथ में बैठाया और उन्हें पूरा नगर घुमाया। इसी घटना की याद में हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथ यात्रा निकाली जाती है, जहाँ भगवान अपने धाम से निकलकर प्रजा का हाल जानने आते हैं।

मौसी के घर जाने की परंपरा: माना जाता है कि रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर ‘गुंडीचा मंदिर’ जाते हैं, जो मुख्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर है। यहाँ तीनों भगवान 9 दिनों तक विश्राम करते हैं, जहाँ उनका खूब लाड-प्यार किया जाता है और स्वादिष्ट छप्पन भोग लगाए जाते हैं।
मूर्तियों के अधूरे रहने का रहस्य (राजा इंद्रद्युम्न की कथा)
- भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां अधूरी (बिना हाथ-पैर के) क्यों हैं, इसके पीछे राजा इंद्रद्युम्न की एक ऐतिहासिक कहानी है:
- मालवा के राजा इंद्रद्युम्न को भगवान विष्णु ने सपने में दर्शन देकर समुद्र में तैरती एक विशाल लकड़ी (काष्ठ) से मूर्तियां बनाने का आदेश दिया।
- जब मूर्तिकार की खोज शुरू हुई, तो स्वयं देव-शिल्पी विश्वकर्मा जी एक वृद्ध बढ़ई का रूप धारण कर राजा के दरबार में पहुंचे।
- उन्होंने एक शर्त रखी कि वह बंद कमरे में 21 दिनों में मूर्ति बनाएंगे और उस दौरान कोई भी कमरे का दरवाज़ा नहीं खोलेगा।
- लेकिन, 15 दिनों के बाद कमरे के अंदर से छैनी-हथौड़ी की आवाज़ आनी बंद हो गई। व्याकुल होकर रानी गुंडीचा और राजा इंद्रद्युम्न ने शर्त तोड़कर कमरा खोल दिया।
कमरा खुलते ही वृद्ध बढ़ई अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियां वैसी ही अधूरी रह गईं जैसी आज हम देखते हैं। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में धरती पर पूजे जाना चाहते हैं।
रथ यात्रा से जुड़े 3 सबसे बड़े तथ्य
सोने की झाड़ू से सफाई (छेरा पहरा रस्म): रथ यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के राजा स्वयं पालकी में आते हैं और सोने की झाड़ू से भगवान के रथों के सामने के रास्ते की सफाई करते हैं। यह रस्म सिखाती है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब एक समान हैं।
बीमार होते हैं भगवान: रथ यात्रा से 15 दिन पहले (ज्येष्ठ पूर्णिमा को) भगवान को 108 घड़ों के ठंडे जल से स्नान कराया जाता है, जिससे वे ‘बीमार’ हो जाते हैं। 15 दिनों तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, जहाँ राजवैद्य उन्हें काढ़ा पिलाते हैं। ठीक होने के बाद ही आषाढ़ द्वितीया को रथ यात्रा निकलती है।
हर साल बनते हैं नए रथ: भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम ‘नंदीघोष’, बलभद्र जी के रथ का नाम ‘तालध्वज’ और सुभद्रा जी के रथ का नाम ‘दर्पदलन’ है। इन रथों के निर्माण में एक भी लोहे की कील का इस्तेमाल नहीं होता।
क्या है रथ यात्रा का इतिहास
जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। इसका उल्लेख कई प्राचीन धार्मिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और पद्म पुराण में मिलता है। माना जाता है कि 12वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने पुरी में भव्य जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया, जिसके बाद से रथ यात्रा को व्यवस्थित रूप से मनाने की परंपरा और अधिक प्रसिद्ध हुई।
समय के साथ यह उत्सव केवल ओडिशा तक सीमित नहीं रहा बल्कि देश और विदेश के अनेक शहरों में भी जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाने लगी। आज यह भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण पर्व बन चुका है।
तीनों रथों का विशेष महत्व
- रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अलग अलग रथों पर विराजमान होते हैं।
- नंदीघोष रथ भगवान जगन्नाथ का रथ है, जिसमें 16 पहिए होते हैं।
- तालध्वज रथ भगवान बलभद्र का रथ है, जिसमें 14 पहिए होते हैं।
- दर्पदलन रथ माता सुभद्रा का रथ है, जिसमें 12 पहिए होते हैं।
- हर वर्ष इन रथों का निर्माण नई लकड़ी से किया जाता है। रथ निर्माण













