महेन्दगढ़: महेंद्रगढ़ के कनीना मंडी स्थित राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में छात्राओं द्वारा सोनम वांगचुक के समर्थन और भाजपा के खिलाफ नारे लगाने के मामले में विद्यालय के प्राचार्य नरेश कुमार को निलंबित कर दिया गया है। वहीं जिला प्रशासन की जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि विद्यालय के किसी भी शिक्षक या कर्मचारी की इस मामले में कोई संलिप्तता नहीं मिली।

नारेबाजी करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
बताया गया है कि 17 जुलाई को 10 से 12 छात्राओं का पोस्टर लेकर नारेबाजी करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। वीडियो सामने आने के बाद उपायुक्त ने जिला शिक्षा अधिकारी से रिपोर्ट मांगी और पूरे मामले की जांच के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की गई। समिति ने छात्राओं, उनके अभिभावकों, प्राचार्य और स्कूल स्टाफ से पूछताछ कर बयान दर्ज किए।
जांच रिपोर्ट में सामने आया कि छात्राएं सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से सोनम वांगचुक के आंदोलन से प्रभावित हुई थीं। छात्राओं ने समिति को बताया कि उन्हें डर था कि यदि पहले इसकी जानकारी दी गई तो अभिभावक और स्कूल प्रशासन इसकी अनुमति नहीं देंगे। इसलिए उन्होंने छुट्टी के बाद विद्यालय से कुछ दूरी पर प्रदर्शन किया।
जांच में स्टाफ की भूमिका नहीं मिली
समिति ने छात्राओं, उनके अभिभावकों, प्राचार्य और विद्यालय स्टाफ के बयान दर्ज किए। जांच रिपोर्ट के अनुसार छात्राएं सोशल मीडिया और इंटरनेट पर चल रहे सोनम वांगचुक के आंदोलन से प्रभावित थीं। उन्होंने समिति को बताया कि यदि वे पहले इसकी जानकारी देतीं तो अभिभावक और स्कूल प्रशासन इसकी अनुमति नहीं देते। इसलिए उन्होंने छुट्टी के बाद विद्यालय से बाहर जाकर प्रदर्शन किया। छात्राओं ने स्वयं पोस्टर तैयार किए थे और इस गतिविधि की जानकारी विद्यालय के किसी शिक्षक या कर्मचारी को नहीं थी। समिति को किसी भी स्टाफ सदस्य द्वारा छात्राओं को उकसाने या सहयोग करने का कोई प्रमाण नहीं मिला।

प्राचार्य नरेश कुमार ने कहा कि घटना स्कूल की छुट्टी के बाद परिसर के बाहर हुई और इसकी जानकारी उन्हें तब मिली, जब जिला शिक्षा अधिकारी तथा अन्य अधिकारियों ने उन्हें सूचित किया। उन्होंने विभाग को अपना स्पष्टीकरण भी सौंप दिया है। उनका कहना है कि यदि समय रहते जानकारी मिल जाती तो छात्राओं को समझाकर ऐसा करने से रोका जाता।
किसी को नहीं थी जानकारी
रिपोर्ट के अनुसार पोस्टर भी छात्राओं ने खुद तैयार किए थे। विद्यालय के किसी शिक्षक या कर्मचारी को पहले से इसकी जानकारी नहीं थी। समिति को जांच के दौरान ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि किसी स्टाफ सदस्य ने छात्राओं को उकसाया या उनका सहयोग किया।













