शुक्रवार, 6 नवम्बर 2026

World Yoga Day: योग साधना में सम्मान का महत्व –  गुरुदेव श्री श्री रविशंकर 

Written by: Harsh Rajput

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  World Yoga Day: विश्व योग दिवस पर जब हम योग की चर्चा करते हैं, तो प्रायः हमारा ध्यान आसनों, प्राणायाम और शारीरिक स्वास्थ्य पर केंद्रित हो जाता है। निस्संदेह ये योग के महत्वपूर्ण…


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World Yoga Day: विश्व योग दिवस पर जब हम योग की चर्चा करते हैं, तो प्रायः हमारा ध्यान आसनों, प्राणायाम और शारीरिक स्वास्थ्य पर केंद्रित हो जाता है। निस्संदेह ये योग के महत्वपूर्ण आयाम हैं, लेकिन योग का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक है। योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की विधि नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और चेतना को परिष्कृत करने का विज्ञान है।

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में साधना की सफलता का एक महत्वपूर्ण सूत्र दिया है-

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 ‘स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारासेवितो दृढ़भूमिः।’

अर्थात् योग का अभ्यास तब दृढ़ता से स्थापित होता है, जब उसे लंबे समय तक, बिना किसी अंतराल के और आदर-भाव के साथ किया जाए।हममें से अधिकांश लोग जीवन में परिवर्तन तो चाहते हैं, लेकिन उसके लिए आवश्यक निरंतरता नहीं रख पाते। कुछ दिनों तक उत्साहपूर्वक योग, ध्यान या प्राणायाम करते हैं, फिर व्यस्तता, आलस्य या ऊब के कारण उसे छोड़ देते हैं। परिणामस्वरूप साधना का प्रभाव भी क्षीण पड़ जाता है।जीवन की हर महत्वपूर्ण उपलब्धि समय मांगती है।

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एक संगीतकार वर्षों तक रियाज करता है, एक खिलाड़ी प्रतिदिन अभ्यास करता है और एक कलाकार अपनी कला को निखारने में लंबे समय तक समर्पित रहता है। यदि बाहरी कौशल विकसित करने में इतना समय और श्रम लगता है, तो मन और चेतना को विकसित करने के लिए धैर्य और निरंतरता की आवश्यकता और भी अधिक है।योग का उद्देश्य केवल शरीर को लचीला बनाना नहीं, बल्कि मन को वर्तमान क्षण में स्थिर करना है। सामान्यतः हमारा मन अतीत की स्मृतियों और भविष्य की आशंकाओं के बीच भटकता रहता है। योग हमें वर्तमान में लौटना सिखाता है।

 

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वर्तमान में स्थित होना ही शांति, संतोष और आंतरिक स्वतंत्रता का आधार है।किन्तु पतंजलि केवल अभ्यास की बात नहीं करते। वे ष्सत्कारासेवितोष् शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है आदर, श्रद्धा और सम्मान के साथ साधना करना। यही वह बिंदु है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।जब हम किसी नए कार्य को आरंभ करते हैं, तो उसमें उत्साह और सजगता होती है।

ध्यान के शुरुआती दिनों में गहराई का अनुभव होता है, प्राणायाम में आनंद आता है और साधना ताजगी प्रदान करती है। लेकिन समय के साथ वह नवीनता कम होने लगती है। अभ्यास बना रहता है, पर उसके प्रति सम्मान कम हो जाता है। तब साधना धीरे-धीरे एक मशीनी क्रिया बन जाती है। यहीं से उसकी शक्ति कम होने लगती है।

सम्मान का अर्थ केवल किसी व्यक्ति, परंपरा या पद्धति का सम्मान करना नहीं है। सम्मान का अर्थ है वर्तमान क्षण के प्रति पूर्ण सजगता और कृतज्ञता। जब हम किसी कार्य को आदर के साथ करते हैं, तब हमारा मन पूरी तरह उसमें उपस्थित होता है। यही उपस्थिति साधना को गहराई प्रदान करती है। जब आप अपने शरीर का सम्मान करते हैं, तब योगासन साधना बन जाते हैं। जब आप अपनी श्वास का सम्मान करते हैं, तब प्राणायाम चेतना को जागृत करने का माध्यम बन जाता है।

 

जब आप अपने मन का सम्मान करते हैं, तब ध्यान सहज रूप से गहरा होने लगता है। आज जीवन में असंतोष का एक बड़ा कारण यह है कि हमने सम्मान और कृतज्ञता की भावना खो दी है। स्वस्थ शरीर, चलती हुई श्वास, प्रकृति का सौंदर्य, परिवार का स्नेह और जीवन के अनगिनत उपहार हमें इतने स्वाभाविक लगने लगे हैं कि हम उनका मूल्य ही भूल गए हैं। योग हमें पुनः कृतज्ञता की ओर लौटाता है। कृतज्ञता से संतोष आता है और संतोष से मन में स्थिरता आती है।

ज्ञान के प्रति सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। जब हम किसी ज्ञान, शिक्षा या मार्गदर्शन को श्रद्धा के साथ ग्रहण करते हैं, तो हमारा मन अधिक ग्रहणशील हो जाता है। सम्मान हमारी चेतना को जागृत करता है और सजगता को बढ़ाता है। यही सजगता ध्यान को गहरा और जीवन को अधिक सार्थक बनाती है। महर्षि पतंजलि ने मन की स्थिरता के लिए दो आधार बताए हैं- अभ्यास और वैराग्य। अभ्यास हमें बार-बार वर्तमान में लौटाता है, जबकि वैराग्य हमें अपेक्षाओं और परिणामों के बोझ से मुक्त रखता है। यदि केवल अभ्यास हो और वैराग्य न हो, तो मन परिणामों में उलझ जाता है।

 

यदि केवल वैराग्य हो और अभ्यास न हो, तो प्रगति रुक जाती है। दोनों का संतुलन ही योग को पूर्णता प्रदान करता है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि योग कोई एक दिन का आयोजन नहीं है। यह जीवन जीने की एक कला है। प्रतिदिन कुछ मिनटों की साधना, सजग श्वास और कृतज्ञता का भाव हमारे जीवन की दिशा बदल सकता है।

 

योग का अर्थ जीवन से दूर जाना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण को पूरी जागरूकता के साथ जीना है। जब साधना में निरंतरता, मन में कृतज्ञता और हृदय में सम्मान जागृत हो जाता है, तब योग केवल अभ्यास नहीं रहताय वह हमारे व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन का स्वभाव बन जाता है। यही योग का वास्तविक उत्सव है और यही पतंजलि के सूत्रों का शाश्वत संदेश भी।

Harsh Rajput
About the Author Harsh Rajput

मै हर्ष चौहान Best24News में बतौर राइटर कार्यरत हूं। रेवाड़ी, धारूहेड़ा और हरियाणा की स्थानीय पत्रकारिता का लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। वे राजनीति, अपराध, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय जनसमस्याओं से जुड़ी खबरों के संपादन एवं प्रकाशन का कार्य करते हैं। उनका उद्देश्य पाठकों तक तथ्यात्मक, निष्पक्ष और विश्वसनीय समाचार पहुंचाना है। View all posts by Harsh Rajput →

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