हरियाणा सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और दूध उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से एक नई पहल शुरू करने जा रही है। इस योजना के तहत प्रदेश के गांवों में चरणबद्ध तरीके से सांझी डेयरी स्थापित की जाएंगी। इन डेयरियों का संचालन स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं करेंगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और डेयरी व्यवसाय को भी नई गति मिलेगी।योजना का सबसे बड़ा उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं डेयरी का संचालन करेंगी और दूध संग्रह से लेकर विपणन तक की गतिविधियों में भाग लेंगी। इससे उनकी आय बढ़ने के साथ-साथ गांवों में स्वरोजगार को भी मजबूती मिलेगी।
300 गज जमीन बेहद कम किराए पर उपलब्ध होगी
सांझी डेयरी स्थापित करने के लिए पंचायत की ओर से लगभग 300 गज जमीन उपलब्ध कराई जाएगी। इसके बदले समूह को केवल 1000 रुपये मासिक किराया देना होगा। भविष्य में यदि डेयरी का विस्तार होता है तो अतिरिक्त 50 गज जमीन देने का भी प्रावधान रखा गया है।सरकार डेयरी से जुड़े स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहित करने के लिए दूध पर प्रति लीटर 7 रुपये तक अतिरिक्त सहायता देने की योजना पर काम कर रही है। यह राशि डेयरी डेवलपमेंट विभाग के माध्यम से दी जाएगी, जिससे डेयरी कारोबार को आर्थिक मजबूती मिलेगी।
दूध उत्पादन बढ़ाने पर रहेगा विशेष फोकस
ग्रामीण इलाकों में पशुपालन का दायरा पहले की तुलना में कम हुआ है, जबकि दूध की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी अंतर को कम करने के लिए सरकार सामुदायिक डेयरी मॉडल पर जोर दे रही है ताकि उत्पादन बढ़े और स्थानीय स्तर पर बेहतर गुणवत्ता का दूध उपलब्ध हो सके।हरियाणा ग्रामीण आजीविका मिशन से प्रदेश में बड़ी संख्या में स्वयं सहायता समूह जुड़े हुए हैं। इन समूहों की हजारों महिलाएं पहले से ही छोटे उद्योग, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण और अन्य आजीविका गतिविधियों में कार्यरत हैं। अब सांझी डेयरी योजना उनके लिए आय बढ़ाने का एक और मजबूत माध्यम बनेगी।
जल्द शुरू होगी चयन प्रक्रिया
अधिकारियों के अनुसार योजना को लागू करने के लिए पंचायतों के सहयोग से पात्र स्वयं सहायता समूहों का चयन किया जाएगा। इसके लिए जल्द आवेदन आमंत्रित किए जाएंगे। चयनित समूहों को डेयरी संचालन से जुड़ी आवश्यक सुविधाएं और सहयोग उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे योजना का लाभ अधिक से अधिक ग्रामीण महिलाओं तक पहुंच सके।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, पशुपालन और दूध उत्पादन तीनों को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही महिलाओं की आर्थिक भागीदारी मजबूत होगी और गांवों की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा मिलेगी।















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