मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

रेवाड़ी: वीडियो गेम में खो गया बचपन! , लुप्त हुए गुल्ली-डंडा और पिट्ठू जैसे पारंपरिक खेल

Written by: हर्ष चौहान

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रेवाड़ी: आधुनिक दौर में जहां तकनीक और स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, वहीं इसका सबसे बड़ा असर बच्चों के बचपन पर पड़ा है। मोबाइल गेमिंग के इस बढ़ते…


रेवाड़ी: वीडियो गेम में खो गया बचपन! , लुप्त हुए गुल्ली-डंडा और पिट्ठू जैसे पारंपरिक खेल
रेवाड़ी: वीडियो गेम में खो गया बचपन! , लुप्त हुए गुल्ली-डंडा और पिट्ठू जैसे पारंपरिक खेल
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रेवाड़ी: आधुनिक दौर में जहां तकनीक और स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, वहीं इसका सबसे बड़ा असर बच्चों के बचपन पर पड़ा है। मोबाइल गेमिंग के इस बढ़ते दौर में आजकल पारंपरिक खेल अब धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर हैं। कभी गांव की चौपालों और गलियों में गूंजने वाला बच्चों का शोरगुल हो तथा हर गली व मोहल्ले में बच्चे खेलते नजर आते थे वही अब मोबाइल की छोटी सी स्क्रीन में सिमट कर रह गया है।

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सूने पडे है खेल के मैदान, बच्चे मोबाइल तक सीमिट

आज ‘राष्ट्रीय वीडियो गेम दिवस’ के अवसर पर ग्रामीण और शहरी इलाकों में यह बदलाव साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है, जहां खेल के मैदान सूने पड़े हैं और बच्चे बंद कमरों में घंटों स्क्रीन पर व्यस्त हैं।

बुजुर्गों को याद आए पुराने दिन

गांव जड़थल निवासी धमेंद्र ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि पहले गर्मी की छुट्टियों या शाम होते ही बच्चे घरों से निकलकर मैदानों में कबड्डी, गुल्ली-डंडा, पिट्ठू, कंचे, खो-खो, रस्सीकूद और लंगड़ी टांग जैसे खेल खेलते थे। इन खेलों के लिए किसी महंगे गैजेट्स, सामान या इंटरनेट की जरूरत नहीं होती थी। बच्चे आपस में मिल-जुलकर खेलते थे, जिससे उनका शारीरिक विकास होने के साथ-साथ अनुशासन, टीम भावना और सहयोग की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित होती थी।

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धारूहेड़ा निवासी बुजुर्ग रामसिंह ने चिंता जताते हुए कहा कि हमारे समय में ये खेल रोज की दिनचर्या का हिस्सा थे। आज की नई पीढ़ी को इन पारंपरिक खेलों के बारे में पता तक नहीं है। यदि समय रहते नई पीढ़ी को इन खेलों से नहीं जोड़ा गया, तो ये इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएंगे। अगर किसी बच्चे को खेलने की बोलते है तुरंत इनकार कर देता है। उनके लिए सब कुछ मोबाइल ही है।

बच्चों के स्वास्थ्य और व्यवहार पर असर

एक दशक पहले बच्चे स्कूल से लौटते ही बस्ता रखकर सीधे मैदान की तरफ दौड़ पड़ते थे। आज मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनकी दिनचर्या व स्वास्थ को प्रभावित कर रहा है। पारंपरिक खेल बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय रखने के साथ-साथ उनमें आत्मविश्वास और टीमवर्क की सीख भी देते थे, जो आज मोबाइल गेमिंग से गायब है। अब गेंग से उनकी आंखे खराब हो रही है लेकिन फिर भी वे गेंग नहीं छोडते है। मोबाइल गेम के चलते बच्चे चिडचिडे हो रहे है।

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संतुलन बनाना बेहद ज़रूरी

महिला आशंका ने बताया कि आज के दौर में तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है। मोबाइल गेम सीमित समय तक तो ठीक हैं, लेकिन बच्चों को कबड्डी, खो-खो और गिल्ली-डंडा जैसे जमीनी खेलों के लिए भी प्रेरित करना चाहिए। इससे उनका स्वास्थ्य बेहतर रहेगा और वे एकाकीपन से बचकर सामाजिक रूप से अधिक सक्रिय हो सकेंगे। ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में हुई एक स्टडी के मुताबिक, वीडियो गेम की लत अतिसंवेदनशील बच्चों के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है क्योंकि ये ऐसे बच्चों में दिल को कमजोर कर देते है।

हर्ष चौहान
About the Author हर्ष चौहान

हर्ष चौहान Best24News के लिए रेवाड़ी जिले की खबरें कवर करते हैं। वे जिले के शहर और गाँवों से जुड़े स्थानीय मुद्दे, प्रशासन के फैसले, विकास कार्य, शिक्षा और आम लोगों से जुड़ी खबरें पाठकों तक पहुँचाते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि रेवाड़ी की हर ज़रूरी खबर तथ्यों की जाँच के साथ सबसे पहले आप तक पहुँचे। View all posts by हर्ष चौहान →

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