रेवाड़ी (Best24News): सनातन धर्म में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। इस बार जन्माष्टमी उत्सव शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा के रहते मध्यरात्रि चंद्रोदय के समय अत्यंत शुभ संयोग में मनाया जा रहा है।
अखिल भारतीय वीर सावरकर मंच (रेवाड़ी) के श्रीनिवास शर्मा के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण के जीवन और उनकी अलौकिक लीलाओं में ‘अंक 8’ का एक अद्भुत और गहरा संबंध रहा है, जिसे शास्त्रों में ‘आठ के ठाठ’ के रूप में जाना जाता है।

श्री कृष्ण के जीवन में ‘अंक 8’ के अनोखे संयोग
- आठवें अवतार: भगवान विष्णु के दशावतारों में श्री कृष्ण 8वें अवतार हैं (मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम के बाद कृष्ण)।
- आठवीं संतान: कंस के अत्याचारों का अंत करने के लिए प्रभु ने माता देवकी की 8वीं संतान के रूप में जन्म लिया।
- अष्टमी तिथि: प्रभु का प्राकट्य भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ, जिसे संपूर्ण विश्व में जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।
- गोपाष्टमी (8 वर्ष की आयु): पहली बार मात्र 8 वर्ष की आयु में श्री कृष्ण गाय चराने जंगल गए थे, जिसे ‘गोपाष्टमी’ कहा जाता है।
- 8 गोमाता व 8 बछड़े: प्रथम बार 8 गोमाता और 8 बछड़ों के साथ प्रभु ग्वाल बने।

- 8 गोप संग गोपाल: पहली बार 8 बाल-सखा (गोपों) के साथ मिलकर वे ‘गोपाल’ कहलाए।
- अष्ट पटरानियाँ: श्री कृष्ण की 8 पटरानियां थीं— रुक्मणि, जाम्बवती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।
- अष्ट सिद्धियाँ: प्रभु को आठों सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्राप्त थीं।
16 कलाओं के पूर्ण अवतार और गीता का अमर संदेश
श्री कृष्ण जन्म के समय 8वां मुहूर्त चल रहा था। 16 कलाओं से परिपूर्ण, चंद्रवंशी भगवान श्री कृष्ण ने मध्यरात्रि चंद्रोदय के समय अवतार लेकर अधर्म का नाश किया। महाभारत के धर्मयुद्ध में उन्होंने सत्य और धर्म का साथ देते हुए पांडवों का मार्गदर्शन किया। “यतो धर्मस्ततो जयः” — जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में दिया गया ज्ञान युगों-युगों तक मानव जाति का मार्गदर्शन करता रहेगा।
लेख: श्रीनिवास शर्मा अखिल भारतीय वीर सावरकर मंच रेवाड़ी
मो.: 8607044744












