रेवाड़ी: हरियाणा में प्राइवेट स्कूलों बीच का विवाद गहराता जा रहा है। ऐसा कोई स्कूल नहीं जहां पर फीस को लेकर अभिभावको को यातनाएं नही सहनी पडती हो। लेकिन अभी कोर्ट के इस फेसले ने स्कूल संचालकों को आंखे खोल कर रख दी है।
जिला न्यायालय, रेवाड़ी ने फीस विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अंतरिम राहत देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल विवादित फीस की मांग के आधार पर किसी छात्र को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत ने आदेश दिया कि मुख्य वाद का अंतिम निर्णय होने तक छात्र शुभम शर्मा को विद्यालय में कक्षाओं में बैठने और पढ़ाई जारी रखने से नहीं रोका जाएगा।
मामले के अनुसार, छात्र शुभम शर्मा ने सीनियर सेकेंडरी स्कूल के विरुद्ध वाद दायर कर आरोप लगाया कि स्कूल द्वारा हरियाणा स्कूल शिक्षा नियमों के विपरीत ₹95,000 की फीस की मांग की जा रही है तथा फीस जमा न करने के कारण उसे 14 नवंबर 2025 से विद्यालय आने से रोक दिया गया। छात्र की ओर से अधिवक्ता कैलाश चंद ने जिला न्यायालय में वाद दायर किया, जिसके बाद छात्र की पढ़ाई पुनः शुरू हो सकी।
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता कैलाश चंद ने न्यायालय को बताया कि स्कूल ने छात्र की दसवीं कक्षा की बोर्ड अंकतालिका भी रोक रखी थी, जिससे वह विभिन्न सरकारी योजनाओं तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आवेदन करने से वंचित हो रहा था। इस पर न्यायालय द्वारा स्कूल पक्ष से जवाब मांगे जाने के बाद छात्र को उसकी बोर्ड अंकतालिका उपलब्ध करा दी गई। इसके बाद स्कूल ने लिखित रूप से छात्र को विद्यालय आने से रोकने की सूचना जारी कर दी।
स्कूल प्रबंधन ने अदालत में कहा कि छात्र नियमित फीस जमा नहीं करता रहा है तथा ₹95,000 की राशि में बकाया ट्यूशन फीस, परिवहन शुल्क एवं अन्य वैध देय शुल्क शामिल हैं। स्कूल का यह भी कहना था कि छात्र आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी में नहीं आता। छात्र की ओर से अधिवक्ता कैलाश चंद ने दलील दी कि फीस विवाद स्कूल और अभिभावकों के बीच का विषय है तथा किसी भी स्थिति में छात्र को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि विवादित शुल्क की वैधता का निर्णय न्यायालय करेगा और तब तक छात्र के शिक्षा के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।
कोर्ट ने सुनाया बडा फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अंतरिम राहत आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि मुख्य मुकदमे के अंतिम निर्णय तक केवल विवादित फीस की मांग के आधार पर छात्र को शिक्षा जारी रखने से नहीं रोका जाएगा। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि शिक्षा का नुकसान और शैक्षणिक सत्र की बर्बादी ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई बाद में धनराशि से नहीं की जा सकती।
अगली सुनवाई होगी 14 अगस्त को
हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ₹95,000 की फीस की मांग वैध है या अवैध, इसका अंतिम निर्णय मुख्य वाद की सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा। यदि अंतिम निर्णय स्कूल के पक्ष में आता है तो वह कानून के अनुसार राशि की वसूली कर सकेगा। मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है।













