Rewari Breaking News: रेवाड़ी: जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बड़ा फैसला सुनाया है। कई महीनों से लंबित धारूहेड़ा स्थित स्प्रिंगवुड्स सिटी परियोजना से जुड़े प्लॉट खरीदारों के पक्ष में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण ने बडा निर्णय लिया।Haryana News
एडवोकेट कैलाश चंद ने बताया कि अनु धीमान, नीतू रानी, सनेह लता, बुद्धि प्रकाश, नरेश कुमार और सुरेंद्र कुमार ने अलग-अलग शिकायतें दायर कर बताया था कि उन्होंने स्प्रिंगवुड्स सिटी परियोजना में प्लॉट बुक करवाए थे। कंपनी ने दो वर्ष के भीतर कब्जा और कन्वेयंस डीड देने का आश्वासन दिया था, लेकिन लाखों रुपये जमा करवाने के बावजूद वर्षों तक न तो कब्जा दिया गया और न ही रजिस्ट्री करवाई गई। शिकायतकर्ताओं ने कानूनी नोटिस भेजने के साथ पुलिस प्रशासन और सीएम विंडो में भी शिकायतें दर्ज करवाई थीं।Haryana News
रेवाड़ी उपभोक्ता आयोग ने अब ये सुनाया आदेश: आयोग ने कंपनी को 45 दिनों के भीतर खरीदारों को प्लॉट का कब्जा देने, सेल डीड निष्पादित करने, जमा राशि पर ब्याज देने तथा प्रत्येक शिकायतकर्ता को 3-3 लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश दिया है। बता दे कि यह फैसला 6 मई 2026 को पीठासीन सदस्य राजेंद्र प्रसाद और सदस्य मुकेश शर्मा की बेंच द्वारा सुनाया गया।
कैंसलेशन लेटरों को किया अवैध करार: सुनवाई के दौरान आयोग के सामने यह तथ्य भी आया कि परियोजना की भूमि विवाद हाई कोर्ट में लंबित था और उस पर स्टे ऑर्डर लागू था। आयोग ने माना कि ऐसे हालात में कंपनी द्वारा खरीदारों से भुगतान मांगना और बाद में प्लॉट रद्द करने के पत्र जारी करना पूरी तरह अनुचित और मनमाना था। आयोग ने कंपनी के कैंसलेशन लेटरों को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया।Haryana News
ब्याज सहित देना होगा जुर्माना:आयोग ने आदेश दिया कि शिकायतकर्ताओं द्वारा जमा करवाई गई राशि पर शिकायत दायर करने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। इतना ही नहीं उपभोक्ता को मानसिक पीड़ा, आर्थिक नुकसान और उत्पीड़न के लिए 3 लाख रुपये मुआवजा तथा 22-22 हजार रुपये मुकदमा खर्च के रूप में देना पडेगा।Rewari Breaking News
उपभोक्ता अधिकारों को लेकर बडा फैसला: आयोग ने स्पष्ट किया कि आदेश का पालन नहीं होने पर शिकायतकर्ता उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 71 के तहत एग्जीक्यूशन कार्यवाही और धारा 72 के तहत आपराधिक कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसला बिल्डरों और कॉलोनाइजर कंपनियों के खिलाफ उपभोक्ता अधिकारों को लेकर बडा फैसला बताया जा रहा है।














