राजस्थान में सरकारी स्कूलों के जर्जर भवनों और कक्षाओं की खराब स्थिति को लेकर एक बार फिर राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि छात्रों की सुरक्षा से जुड़ा यह मामला बेहद गंभीर है, लेकिन सरकार की कार्यशैली से ऐसा प्रतीत होता है कि स्कूलों की मरम्मत उसकी प्राथमिकताओं में शामिल ही नहीं है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की धीमी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जुलाई से अब तक राज्य के कई स्कूलों में हादसे सामने आ चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद सुधार की गति बेहद धीमी है। अदालत ने यह भी कहा कि मार्च में वित्तीय वर्ष समाप्त होने वाला है और बजट लैप्स होने का खतरा है, फिर भी सरकार केवल टेंडर जारी करने की प्रक्रिया में ही उलझी हुई है।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि पिछले कुछ महीनों में कई सरकारी स्कूलों में भवन गिरने या कक्षाओं के क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं सामने आई हैं। खासतौर पर भरतपुर और बूंदी जिलों में हुए हादसों का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि इन घटनाओं के बाद भी प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नजर नहीं आ रहा है।
अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकार को ज्यादा गंभीरता दिखानी चाहिए। अगर समय रहते मरम्मत और रखरखाव का काम नहीं किया गया, तो भविष्य में और बड़े हादसे हो सकते हैं। सरकार की ओर से पेश की गई रिपोर्ट पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने कहा कि जुलाई से लेकर अब तक केवल चार स्कूलों में ही मरम्मत का काम शुरू हुआ है। यह संख्या बेहद कम है, खासकर तब जब राज्य में सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जिनकी हालत बेहद खराब बताई जा रही है।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर सरकार इसी गति से काम करती रही तो जर्जर भवनों की समस्या जल्द दूर होना मुश्किल है। अदालत ने यह भी पूछा कि जब बजट उपलब्ध है, तो फिर काम शुरू होने में इतनी देरी क्यों हो रही है। खंडपीठ ने सरकार से सीधे तौर पर सवाल किया कि आखिर उसकी प्राथमिकता क्या है। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि स्कूल भवनों की मरम्मत सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं है, क्योंकि लंबे समय से केवल टेंडर जारी करने की प्रक्रिया ही चल रही है।
कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा से समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। अगर सरकार समय पर कदम नहीं उठाती है तो अदालत को सख्त आदेश जारी करने पड़ सकते हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने एक अहम सुझाव भी दिया। कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़ने पर चार्टर्ड इंजीनियरों की नियुक्ति की जा सकती है, जो स्कूल भवनों का निरीक्षण करें और उनकी सुरक्षा का आकलन करें। अदालत ने यह भी कहा कि 1 जुलाई से केवल उन्हीं स्कूलों में कक्षाएं संचालित की जाएं, जिनके भवनों को इंजीनियर सुरक्षित घोषित करें। जिन स्कूलों के भवन असुरक्षित पाए जाएं, वहां पहले मरम्मत का कार्य पूरा किया जाए और उसके बाद ही पढ़ाई शुरू की जाए।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और शिक्षा विभाग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। जर्जर स्कूल भवनों में पढ़ाई करवाना बच्चों की जान जोखिम में डालने जैसा है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए और जल्द से जल्द आवश्यक कदम उठाए जाएं। साथ ही मरम्मत कार्यों की प्रगति पर नियमित रिपोर्ट भी अदालत के समक्ष पेश की जाए।
इस मामले की अगली सुनवाई में अदालत सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगी। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो कोर्ट और सख्त रुख अपना सकता है।

















