Delhi News: दिल्ली में करीब 53 साल बाद एक बार फिर कृत्रिम वर्षा का प्रयोग किया गया। इस बार इसका उद्देश्य राजधानी की जहरीली हवा को कुछ हद तक साफ करना था। यह प्रयोग भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान पुणे और आईआईटी कानपुर के सहयोग से किया गया।
पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि एक सेसना विमान ने कानपुर से उड़ान भरी और दिल्ली के बुराड़ी, करोल बाग और मयूर विहार जैसे इलाकों में रसायनों का छिड़काव किया। यह प्रयोग करीब आधे घंटे तक चला। हर झोंके में दो से ढाई किलो रसायन डाले गए और बादलों में करीब 15 से 20 प्रतिशत नमी मौजूद थी।
इतिहास में तीसरा प्रयास
दिल्ली में कृत्रिम वर्षा का यह तीसरा प्रयोग था। इससे पहले पहला परीक्षण 1957 में मानसून के दौरान हुआ था और दूसरा प्रयास 1970 के दशक की शुरुआत में सर्दियों में किया गया था। उस समय राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला परिसर में करीब 25 किलोमीटर के क्षेत्र में यह प्रयास किया गया था।
पुराने प्रयोगों का असर
आईआईटीएम की रिपोर्ट के अनुसार 1971 और 1972 में हुए परीक्षणों में सिल्वर आयोडाइड कणों का इस्तेमाल किया गया था जिनसे बादलों में नमी संघनित होकर बूंदों में बदल गई थी। उन प्रयोगों से यह संकेत मिला था कि सही मौसम परिस्थितियों में कृत्रिम वर्षा संभव है।
आगे की दिशा
दिल्ली सरकार आने वाले दिनों में और ऐसे परीक्षण करने की योजना बना रही है ताकि सर्दियों के दौरान प्रदूषण के स्तर को कम किया जा सके। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में यह तकनीक दिल्ली की हवा को साफ रखने में अहम भूमिका निभा सकती है।
















