Health News: अक्सर लोगों की यह धारणा होती है कि गंभीर बीमारी होने से पहले शरीर तेज दर्द या स्पष्ट लक्षणों के जरिए चेतावनी देता है, लेकिन मेडिकल साइंस की सच्चाई इससे अलग है। विशेषज्ञों के मुताबिक कैंसर के कुछ प्रकार ऐसे होते हैं जो वर्षों तक बिना किसी ठोस लक्षण के शरीर में चुपचाप बढ़ते रहते हैं।Health News
यही कारण है कि जब तक मरीज को बीमारी का अहसास होता है, तब तक कैंसर खतरनाक स्टेज में पहुंच चुका होता है। ओवरी, पैंक्रियाज और फेफड़ों का कैंसर ऐसे ही साइलेंट किलर माने जाते हैं, जो समय पर पकड़ में न आने पर जानलेवा साबित हो सकते हैं।महिलाओं में डिम्बग्रंथि यानी ओवरी का कैंसर सबसे ज्यादा नजरअंदाज किए जाने वाले कैंसरों में शामिल है।Health News
इसके शुरुआती लक्षण बेहद सामान्य और हल्के होते हैं, जैसे पेट का थोड़ा फूलना, जल्दी पेट भर जाना, गैस की समस्या या निचले पेट में हल्की असहजता। अधिकतर महिलाएं इन्हें पाचन से जुड़ी परेशानी या हार्मोनल बदलाव मानकर नजरअंदाज कर देती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आंकड़ों के अनुसार ओवरी कैंसर के लगभग दो-तिहाई मामले तब सामने आते हैं, जब बीमारी तीसरे या चौथे स्टेज में पहुंच चुकी होती है और पेट के अन्य हिस्सों तक फैल जाती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है।
अग्न्याशय यानी पैंक्रियाज का कैंसर दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि शुरुआती चरण में यह लगभग कोई लक्षण नहीं देता। न तो स्पष्ट दर्द होता है और न ही पीलिया या गंभीर पाचन समस्या दिखाई देती है। ज्यादातर मरीज तब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, जब तेज पेट दर्द, अचानक वजन कम होना या आंखों और त्वचा में पीलापन जैसे लक्षण उभरते हैं। इस अवस्था तक पहुंचने पर सर्जरी के विकल्प भी सीमित हो जाते हैं, जिससे मरीज के बचने की संभावना कम हो जाती है।
फेफड़ों का कैंसर भी साइलेंट किलर की श्रेणी में आता है और कैंसर से होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण माना जाता है। इसके शुरुआती संकेत अक्सर मामूली होते हैं, जैसे लंबे समय तक बनी रहने वाली हल्की खांसी, सांस फूलना या लगातार थकान।
खासकर धूम्रपान करने वाले लोग इन लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार करीब 70 प्रतिशत मरीज तब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, जब कैंसर तीसरे या चौथे स्टेज में पहुंच चुका होता है। समय रहते जांच और पहचान होने पर कई मामलों में जान बचाई जा सकती है।
महिलाओं को क्या पता होना चाहिए?
जल्दी पता करने से बीमारी ठीक करने में मदद मिलती है। अपने शरीर के बारे में जानकारी होनी चाहिए और क्या सामान्य है और क्या नहीं, यह जानना जरूरी है। अल्ट्रासाउंड, पैल्विक टेस्ट और ब्लड टेस्ट जैसे तकनीक से इसका पता किया जा सकता है।
डॉक्टर के साथ फैमिली हिस्ट्री पर चर्चा करने से जेनेटिक टेस्टिंग या प्रीवेंटिव स्ट्रेटेजी की जरूरतों का आकलन करने में भी मदद मिल सकती है। कुछ उच्च जोखिम वाले मामलों में, प्रसव पूरा होने के बाद खतरा कम करने वाली सर्जरी पर विचार किया जा सकता है।Health News

















