Haryana : 42 वर्षों की ख़ामोशी को तोड़ेगी गुरबाणी : होंद चिल्लड़ की खून से सनी धरती फिर मांगेगी इंसाफ़

On: February 2, 2026 5:38 PM
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जहां मासूम बच्चों को दीवारों से पटक कर मारा गया, बुज़ुर्गों को ज़िंदा जलाया गया — उसी जगह 3 फ़रवरी को शहीदों की अरदास होगी

Haryana: जहां मासूम बच्चों को दीवारों से पटक कर मारा गया, बुज़ुर्गों को ज़िंदा जलाया गया — उसी जगह 3 फ़रवरी को शहीदों की अरदास होगी होंद चिल्लड़… एक ऐसा नाम जो आज भी सिख कौम की रूह को कंपा देता है। वह धरती जहां 1984 के नरसंहार के दौरान 32 निर्दोष सिखों को बेरहमी से पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया गया। 2 साल के मासूम बच्चों से लेकर 70 साल तक के बुज़ुर्गों तक — किसी को भी नहीं बख़्शा गया।

उसी खून से रंगी धरती पर 3 फ़रवरी को सुबह 10 बजे शहीदों की याद में गुरबाणी का पाठ और अरदास की जाएगी। 42 वर्षों बाद भी जब इंसाफ़ नहीं मिला, तो अब गुरबाणी की आवाज़ के ज़रिये ज़मीरों को जगाने की कोशिश की जा रही है।

पत्रकारों से बातचीत करते हुए पायल हलके से विधायक और होंद चिल्लड़ तालमेल कमेटी के प्रधान इंजीनियर मनविंदर सिंह ग्यासपुरा ने भर्राए गले से कहा कि होंद चिल्लड़ वह जगह है जहां भीड़ ने 2 साल के मासूम बच्चे को दीवार से पटक-पटक कर मार डाला था, जहां 70 साल के बुज़ुर्गों को भी नहीं बख़्शा गया और उन पर तेल डालकर ज़िंदा जला दिया गया। उन्होंने कहा कि ये सिर्फ़ हत्याएं नहीं थीं, यह इंसानियत की हत्या थी।

खामोशी, गुरबाणी की पुकार और इंसाफ़ की अधूरी लड़ाई
खामोशी, गुरबाणी की पुकार और इंसाफ़ की अधूरी लड़ाई

ग्यासपुरा ने दर्द साझा करते हुए कहा कि 42 साल बीत जाने के बावजूद आज तक अदालतों से सिर्फ़ तारीख़ें ही मिली हैं। न दोषियों को सज़ा मिली, न ही शहीदों की आत्माओं को सुकून। उन्होंने कहा कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की ख़ामोशी, कांग्रेस का खूनी पंजा और भाजपा का दोहरा चेहरा — तीनों ही इंसाफ़ के रास्ते में रुकावट बने हुए हैं।

उन्होंने ऐलान किया कि इस कार्यक्रम के दौरान उन सभी स्थानों को लोगों के सामने लाया जाएगा जहां दरिंदगी ने सारी हदें पार कीं — वह दीवार, जहां मासूम बच्चे की जान ली गई, और वह जगह जहां बुज़ुर्गों को आग के हवाले किया गया। यह सब लोगों को दिखाकर अदालतों और सत्ता में बैठे लोगों के ज़मीर को झकझोरने की कोशिश की जाएगी।

ग्यासपुरा ने कहा कि शहीदों के समक्ष गुरबाणी पाठ और अरदास कर इंसाफ़ की आवाज़ को और बुलंद किया जाएगा। इसके साथ ही इंसाफ़ न देने वालों और भाजपा के ख़िलाफ़ विरोध स्वरूप पुतला दहन भी किया जाएगा।

उन्होंने कहा,
“हम सवाल पूछेंगे — क्या यही आज़ाद भारत है? जहां मासूमों के क़ातिल आज भी आज़ाद घूम रहे हैं और शहीदों के वारिस आज भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं।”

होंद चिल्लड़ का यह कार्यक्रम सिर्फ़ एक स्मृति नहीं, बल्कि 42 वर्षों से दबी हुई चीख़ का ऐलान होगा — इंसाफ़ लेकर रहने की कसम।

होंद चिल्लड़ की त्रासदी: इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ते समय आंखें नम हो जाती हैं, और कुछ ऐसे जिन पर नज़र पड़ते ही आत्मा कांप उठती है। 1984 का नरसंहार और हरियाणा में रेवाड़ी जिला के गांव होंद चिल्लड़ की वह त्रासदी उन्हीं काले अध्यायों में दर्ज है, जो सिर्फ़ सिख समुदाय का दर्द नहीं, बल्कि पूरे भारत की अंतरात्मा पर लगा ऐसा दाग है, जिसे समय भी फीका नहीं कर पाया। आज़ादी के दशकों बाद भी अगर किसी देश की धरती अपने ही नागरिकों के खून से रंगी हो और पीड़ित परिवार इंसाफ़ के लिए दर-दर भटक रहे हों, तो यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक असफलता बन जाती है।

होंद चिल्लड़ का नाम लेते ही वह भयावह दृश्य आंखों के सामने तैर उठते हैं, जब उन्मादी भीड़ ने इंसानियत की सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। दो साल के मासूम बच्चों को दीवारों से पटक-पटक कर मार दिया गया, बुज़ुर्गों को तेल डालकर जिंदा जला दिया गया, घरों को राख कर दिया गया और सड़कों पर मानवता का खून बहता रहा। यह कोई युद्ध नहीं था, यह किसी सीमा की लड़ाई नहीं थी; यह अपने ही देश में अपने ही नागरिकों का योजनाबद्ध संहार था। यह हिंसा नहीं, हैवानियत थी; यह हत्या नहीं, इंसानियत का कत्ल था।

सच यह भी है कि दंगे अपने आप नहीं होते, उन्हें होने दिया जाता है। भीड़ अचानक हैवान नहीं बनती, उसे सत्ता की चुप्पी, प्रशासन की निष्क्रियता और नेताओं के स्वार्थ से बल मिलता है। 1984 की त्रासदी में यही हुआ। सत्ता बदलती रही, सरकारें आईं-गईं, भाषण दिए गए, संवेदनाएं व्यक्त की गईं, लेकिन इंसाफ़ की राह हमेशा लंबी होती गई। अदालतों में फाइलें चलती रहीं, तारीख़ें पड़ती रहीं, पर दोषियों को सज़ा नहीं मिली। 42 वर्षों का यह इंतज़ार केवल न्याय में देरी नहीं, न्याय के साथ अन्याय है।

होंद चिल्लड़ का नाम लेते ही वह भयावह दृश्य आंखों के सामने तैर उठते हैं, जब उन्मादी भीड़ ने इंसानियत की सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। दो साल के मासूम बच्चों को दीवारों से पटक-पटक कर मार दिया गया,
होंद चिल्लड़ का नाम लेते ही वह भयावह दृश्य आंखों के सामने तैर उठते हैं, जब उन्मादी भीड़ ने इंसानियत की सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। दो साल के मासूम बच्चों को दीवारों से पटक-पटक कर मार दिया गया,

हमारा संविधान समानता और न्याय की गारंटी देता है, लेकिन जब पीड़ित परिवार आधी सदी तक अदालतों के चक्कर लगाते रहें, तो सवाल उठना लाज़मी है कि संविधान की आत्मा आखिर कहां सो गई है। अगर इंसाफ़ मिलने में पीढ़ियां गुजर जाएं, तो वह न्याय नहीं, व्यवस्था पर व्यंग्य बन जाता है। ऐसे में पीड़ितों का भरोसा केवल अदालतों से नहीं, पूरे लोकतंत्र से उठने लगता है।

 

होंद चिल्लड़ की त्रासदी हमें यह भी सिखाती है कि अत्याचार केवल अपराधियों से नहीं, समाज की चुप्पी से भी जन्म लेता है। जब हम अन्याय देखकर भी मौन रहते हैं, तब हम भी उस अन्याय के भागीदार बन जाते हैं। इसलिए यह संघर्ष केवल एक समुदाय का नहीं, हर उस भारतीय का है जो लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और मानवता में विश्वास रखता है।

आज जरूरत केवल श्रद्धांजलि देने की नहीं, बल्कि संकल्प लेने की है। संकल्प इस बात का कि धर्म कभी नफ़रत का हथियार नहीं बनेगा, राजनीति कभी मानवता से बड़ी नहीं होगी और कानून कभी इतना कमजोर नहीं पड़ेगा कि पीड़ितों को पीढ़ियों तक इंतजार करना पड़े। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की असली पहचान उसके विकास, भाषणों या नारों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को कितना न्याय दिला पाता है।

Sunil Chauhan

सुनील चौहान हरियाणा के रेवाड़ी और धारूहेड़ा क्षेत्र की खबरों को कवर करते हैं। उन्हें पत्रकारिता में 10 साल का अनुभव है और वे सामाजिक, प्रशासनिक और स्थानीय मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।

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