Breaking news: करनाल जिले में कस्टम मिलिंग व्यवस्था के तहत बड़ा घोटाला सामने आया है। जिले की 58 राइस मिलों पर सरकार को करीब 308 करोड़ रुपये का चूना लगाने का आरोप है। मामला बीते लगभग 12 वर्षों का बताया जा रहा है, जिसमें मिल संचालकों ने सरकारी एजेंसियों से धान तो लिया, लेकिन तय समय पर सरकार को चावल वापस नहीं किया। इसके बावजूद संबंधित विभागों की ओर से समय रहते कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई।
जानकारी के अनुसार कस्टम मिलिंग योजना के तहत खाद्य एवं आपूर्ति विभाग राइस मिलों को धान आवंटित करता है। नियमों के मुताबिक मिल संचालकों को तय प्रतिशत में चावल सरकार को लौटाना होता है। आरोप है कि कई राइस मिलों ने धान का उठान तो किया, लेकिन चावल जमा नहीं कराया। इससे सरकार को सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े स्तर पर अनियमितताओं के बावजूद विभागीय अधिकारी लंबे समय तक चुप्पी साधे रहे।
मामले में यह भी सामने आया है कि संबंधित विभागों के पास डिफॉल्टर राइस मिलों की सूची होने के बावजूद उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। इससे संदेह गहराता है कि कहीं न कहीं अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से यह खेल चलता रहा। जानकारों का कहना है कि बिना विभागीय संरक्षण के इतने लंबे समय तक इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं है।
सूत्रों के मुताबिक कई बार उच्च अधिकारियों को स्थिति से अवगत कराया गया, लेकिन फाइलें आगे नहीं बढ़ीं। जब तक धान का नुकसान सीमित स्तर पर रहा, तब तक अनदेखी की जाती रही, लेकिन अब जब आंकड़ा सैकड़ों करोड़ तक पहुंच गया है, तब जाकर मामला चर्चा में आया है। वर्तमान में रिकवरी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है, क्योंकि कई राइस मिल आर्थिक रूप से कमजोर होने या बंद होने की बात कह रही हैं।
इस पूरे मामले ने कस्टम मिलिंग व्यवस्था और विभागीय निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर समय रहते कार्रवाई होती और जवाबदेही तय की जाती, तो सरकारी खजाने को इतना बड़ा नुकसान नहीं उठाना पड़ता। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में दोषी राइस मिलरों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई करता है।

















