Breaking News: जैन धर्म में रक्षाबंधन का महत्व एक ऐतिहासिक और धार्मिक घटना से जुड़ा हुआ है, जो भगवान मुनिसुव्रत के समय की मानी जाती है। उस समय उज्जैनी के राजा श्रीवर्मा के चार मंत्री — बलि, नामुचि, बृहस्पति और प्रह्लाद — धर्मविरोधी प्रवृत्ति के थे।
आचार्य श्री अकम्पन जी 700 मुनियों के साथ नगर में पधारे, जहां राजा ने आदरपूर्वक वंदन किया, लेकिन मंत्रीगण उनकी निंदा करते हुए लौट गए। मुनियों की निंदा सुनकर मुनि श्री श्रुतसागर जी ने वाद-विवाद में उन्हें परास्त किया, जिससे अपमानित मंत्री बदले की भावना से भर गए।
रात में वे मुनि की हत्या के इरादे से गए, लेकिन चमत्कारवश उनका हाथ स्थिर हो गया और राजा ने उन्हें राज्य से बाहर कर दिया। ये मंत्री हस्तिनापुर पहुंचे और राजा पद्मराय से निकटता बढ़ाई। समय आने पर, उन्होंने 700 मुनियों को घेरकर उन पर उपसर्ग करने की योजना बनाई। मुनियों के चारों ओर मांस, हड्डी, चमड़ी का ढेर लगाकर आग लगा दी गई।
यह समाचार राजा पद्मराय के भाई, मुनि विष्णुकुमार को मिला। उन्होंने ब्राह्मण पंडित का रूप धारण कर बलि राजा से तीन पग भूमि मांगी। विराट रूप धारण कर उन्होंने एक पग सुमेरु पर्वत पर, दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर रखा और तीसरा पग बलि के सिर पर रखने की चेतावनी दी। भयभीत होकर बलि व अन्य मंत्रियों ने क्षमा मांगी। विष्णुकुमार मुनि ने सभी को अहिंसा और धर्म का महत्व समझाया तथा 700 मुनियों को उपसर्ग से मुक्त कराया।
यह घटना श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन हुई, और उसी दिन को “रक्षा पर्व” के रूप में मनाया जाने लगा, जो आज रक्षाबंधन के नाम से प्रसिद्ध है। जैन दृष्टिकोण से, इसका वास्तविक अर्थ केवल धागा बांधना नहीं, बल्कि धर्म, अहिंसा और आत्मस्वरूप की रक्षा करना है।
जैनम् जयतु शासनम् — सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं।

















