Mahavir Jayanti: धारूहेड़ा: यहां के सेक्टर छह स्थित शातिनांथ जैन मंदिर में तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी का 2625 वाँ जन्म “जन्म कल्याणक” दिवस के रूप में मनाया गया। इस मौके पर श्री 1008 महावीर स्वामी प्रभु की प्रतिमा का 108 चांदी के कलशो से 108 दिव्या मन्त्रों सहित अभिषेक किया Mahavir JayantiRewari News: बावल में भयंकर ओलावृष्टि, किसानों की मेहनत पर फिरा पानी
मंदिर संचालक प्रदुमैन जैन ने बताया कि जब-जब मानवता दिशा भूलती है, तब-तब कोई महान आत्मा जन्म लेकर उसे पुनः सत्य, करुणा और संयम के मार्ग पर स्थापित करती है। तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी का 2625 वाँ जन्म-कल्याणक केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मजागरण का आह्वान है—एक ऐसा अवसर, जब हम अपने भीतर झांककर यह प्रश्न करें कि क्या हम वास्तव में उस मार्ग पर चल रहे हैं, जिसे महावीर ने अपने तप, त्याग और अनुभव से प्रकाशित किया था?
धारूहेड़ा: यहां के सेक्टर छह स्थित शातिनांथ जैन मंदिर में तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी का 2625 वाँ जन्म “जन्म कल्याणक” दिवस के रूप में मनाया गया
“अहिंसा परमो धर्मः” ‘ आज का युग विज्ञान, तकनीक और भौतिक उपलब्धियों का युग है। परन्तु इसके साथ ही यह तनाव, हिंसा, असहिष्णुता और अनियंत्रित इच्छाओं का भी युग बन गया है। मनुष्य के पास सब कुछ है, फिर भी शांति नहीं है। ऐसे समय में तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी का संदेश “अहिंसा परमो धर्मः” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्यता बन जाता है। अहिंसा का अर्थ केवल बाहरी हिंसा से बचना नहीं, बल्कि विचारों, शब्दों और भावनाओं में भी कोमलता और करुणा का समावेश करना है।
संयम का अर्थ जीवन को सीमित रहना नही: तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी ने हमें सिखाया कि असली विजय बाहरी संसार पर नहीं, बल्कि अपने मन और इन्द्रियों पर होती है। आज जब व्यक्ति सोशल मीडिया की चमक-दमक और तुलना के जाल में फँसकर स्वयं को खो रहा है, तब “संयम” का महत्व और भी बढ़ जाता है। संयम का अर्थ जीवन को सीमित करना नहीं, बल्कि उसे सही दिशा देना है।
इस युग की सबसे बड़ी समस्या है: अधिकता (Overconsumption)। चाहे वह भोजन हो, धन हो, या इच्छाएँ—हर चीज़ में अति ने असंतुलन पैदा कर दिया है। महावीर का “अपरिग्रह” का सिद्धांत आज के समय में पर्यावरण संरक्षण से लेकर मानसिक शांति तक हर क्षेत्र में समाधान प्रस्तुत करता है। यदि हम सीमित संसाधनों में संतुष्टि सीख लें, तो न केवल प्रकृति सुरक्षित रहेगी, बल्कि हमारा मन भी हल्का और प्रसन्न रहेगा।
धारूहेड़ा: यहां के सेक्टर छह स्थित शातिनांथ जैन मंदिर में तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी का 2625 वाँ जन्म “जन्म कल्याणक” दिवस के रूप में मनाया गया
तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी ने “अनेकांतवाद” का सिद्धांत देकर यह सिखाया कि सत्य एकांगी नहीं होता। हर व्यक्ति का दृष्टिकोण अलग हो सकता है, और हमें दूसरों के विचारों का सम्मान करना चाहिए। आज के विभाजित समाज में, जहाँ विचारों की भिन्नता को शत्रुता का कारण बना दिया गया है, वहाँ अनेकांतवाद ही संवाद और सौहार्द का सेतु बन सकता है।
2625 वें जन्मकल्याणक के इस पावन अवसर पर हमें केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह समय है—अपने भीतर महावीर को जागृत करने का।
क्या हम अपने क्रोध को क्षमा में बदल सकते हैं?
क्या हम अपने लोभ को संतोष में परिवर्तित कर सकते हैं?
क्या हम अपने अहंकार को विनम्रता में ढाल सकते हैं?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर “हाँ” में आने लगें, तभी यह उत्सव सार्थक होगा।
आज आवश्यकता है कि हम तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी के सिद्धांतों को आधुनिक जीवनशैली में उतारें—
•अपने खान-पान में सादगी अपनाएँ
•डिजिटल जीवन में संयम रखें
•प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनें
•और सबसे महत्वपूर्ण—हर जीव के प्रति करुणा का भाव रखें
धारूहेड़ा: यहां के सेक्टर छह स्थित शातिनांथ जैन मंदिर में तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी का 2625 वाँ जन्म “जन्म कल्याणक” दिवस के रूप में मनाया गया
तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा धर्म मंदिरों में नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार में प्रकट होता है। जब हमारा हर कार्य अहिंसा, सत्य और प्रेम से प्रेरित होगा, तभी हम सच्चे अर्थों में तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी के अनुयायी बन सकेंगे।
अंततः, यह जन्म – कल्याणक हमें एक संकल्प लेने का अवसर देता है—
हम स्वयं को बदलेंगे, तभी युग बदलेगा।
तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी का प्रकाश केवल इतिहास की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की दिशा है।
आइए, तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी के 2625 वें जन्मकल्याणक पर हम सभी अपने भीतर के अंधकार को मिटाकर, आत्मा के उस दिव्य प्रकाश को प्रकट करें, जो तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी ने हमें दिखाया था।
108 चांदी के कलशो से किया अभिषेक‘ जैन मंदिर के संचालक प्रदुमैन जैन ने बताया कि अतिशय क्षेत्र “कल्पतरु सर्वोदय तीर्थ” श्री 1008 शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर धारूहेड़ा में पंडित श्री यथार्थ जैन के सान्निध्य में श्री तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी प्रभु की जिन प्रतिमा का 108 चांदी के कलशो से 108 दिव्या मन्त्रों सहित अभिषेक , बृहद शांतिधारा, परम पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री 105 ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित मनोकामना सिद्धि विधान , जीव-दया के साथ-साथ अल्पाहार भंडारे के रूप में में सामूहिक रूप से पुण्यशाली श्रावको के द्वारा होकर पुण्य अर्जित किया गया।
“जियो और जीने दो”—इसी में समस्त मानवता और विश्व का कल्याण निहित है। तीर्थंकर श्री 1008 महावीर स्वामी जन्म – कल्याणक महोत्सव की हार्दिक बधाई एवं अनंत मंगल कामनाएँ!
सुनील चौहान हरियाणा के रेवाड़ी और धारूहेड़ा क्षेत्र की खबरों को कवर करते हैं।
उन्हें पत्रकारिता में 10 साल का अनुभव है और वे सामाजिक, प्रशासनिक
और स्थानीय मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।