Rewari News : रागनी: वीर संन्यासी विवेकानंद
अरे देश-धरम की जोत जगाई, गेरुआ बाणा धारे था,
वो भारत माँ का शेर लाडला, जग में जीतण हारे था।
रेवाड़ी आली माटी बोलै, सुण लो वीर जवानां ने,
विवेकानंद सा वीर ना दूजा, तोड्या घोर अज्ञानां ने।
साल अठारह सौ तिरानवे, सात समुंदर पार गया,
ज्ञान की लाठी हाथ में लेकर, दुनिया नै ललकार गया।
“भाईयों और बहणों” कहकै, सारा मजमा जीत लिया,
भारत की उस ऋषियाँ आळी, मर्यादा नै रीत लिया।
बिना शस्त्र के जीत गया वो, ज्ञान का तेज अपारे था,
वो भारत माँ का शेर लाडला, जग में जीतण हारे था।
कोरी पोथी पढ़णा कोनी, माणस बणना सीखो रे,
दम सै जिसमें वो ए जिन्दा, दूजे सारे फीको रे।
लोहे जैसी नस बणाओ, मन में राखो फौलाद ने,
कर्मयोग की राह पकड़ लो, भूल जाओ अवसाद ने।
पढ़-लिख कै जो सेवा ना करै, वो खुद पै बोझ भारी था,
वो भारत माँ का शेर लाडला, जग में जीतण हारे था।
कुमार मनोज वशिष्ठ कहवै, स्कूल नै स्वर्ग बणावांगे,
विज़न २०२६ ल्याकै, बालकां का भाग जगावांगे।
हाथ में कंप्यूटर होवै, और मन में वेद-पुराण रहै,
अकल चले विज्ञान पै म्हारी, ऊँचा देश का मान रहै।
हर बालक विवेकानंद बणै, यो ए लक्ष्य म्हारे था,
वो भारत माँ का शेर लाडला, जग में जीतण हारे था।
उठो! जागो! रुकना कोनी, जब तक मंजिल मिल ज्या ना,
मुरझाया जो चमन देश का, जब तक पूरा खिल ज्या ना।
स्वामी जी की राह पै चालो, झंडा ऊँचा फहराओ,
भारत माँ के सच्चे सपूतों, जग में अपना नाम कमाओ।

















