हरियाणा सरकार की प्रोत्साहन नीति की बदौलत आज सूबे के किसान परम्परागत खेती का मोह त्याग कर बागवानी और ऑर्गेनिक खेती के साथ- साथ पशुपालन और मत्स्य पालन व्यवसाय में अपनी नई पहचान स्थापित कर रहे हैं. ऐसा ही एक उदाहरण झज्जर के गांव पाटौदा निवासी मात्र 7वीं कक्षा तक पढ़े संजय उर्फ सुदामा ने पेश किया है. उन्होंने साबित कर दिया है कि सफलता हासिल करने के लिए उच्च शिक्षा नहीं बल्कि नेक इरादे और उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है.
सरकार देती है इतनी सब्सिडी: संजय ने बताया कि जिला मत्स्य विभाग की ओर से मछलियों के परिवहन के लिए एक छोटा टैंपो वाहन उपलब्ध कराया गया है. झींगा पालन व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए उन्हें करीब 8 लाख रुपए की सब्सिडी भी दी गई है. उन्होंने बताया कि साल 2016 में हिसार से झींगा पालन की ट्रैनिंग हासिल की थी. इसके बाद, उन्होंने जोखिम उठाते हुए करीब 5 लाख रुपए इन्वेस्ट कर एक तालाब में झींगा मछली पालन शुरू किया. पहले काफी चुनौतीपूर्ण रहा लेकिन तकनीकी जानकारी और लगातार प्रयास के बलबूते उन्होंने उत्पादन को बढ़ाया और आज ढाई एकड़ जमीन पर मछली पालन कर रहे हैं.
जानिए कहां कहां है इसकी डिमांड: किसान संजय ने बताया कि लगभग दस साल पहले एक एकड़ जमीन पर झींगा मछली पालन व्यवसाय शुरू किया था और आज यह कारवां ढाई एकड़ तक पहुंच चुका है. इसके लिए वह विशाखापट्टनम, चेन्नई और पुडुचेरी से बीज मंगवाते हैं. इस खारे पानी के झींगा सीड को विशेष रूप से तैयार किया जाता है. उनके यहां तैयार हो रही झींगा मछली की दिल्ली, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और केरल सहित कई अन्य राज्यों में भारी डिमांड रहती है.
उन्होंने बताया कि दूसरे राज्यों से व्यापारी उनके फॉर्म पर आकर झींगा मछली की खरीदारी करते हैं. इससे उन्हें बाजार तक भागदौड़ करने की जरूरत नहीं पड़ती है. गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति के कारण उनके उत्पाद विशेष पहचान स्थापित कर चुके हैं. 1 एकड़ के लिए लगभग 1 लाख रुपए का बीज आता है और ढाई एकड़ जमीन पर मछली पालन से वह 50 लाख रुपए तक कमाई कर रहा है.
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ये बाते जरूर ध्यान में रखें: उन्होंने बताया कि साल में दो बार, पहले मार्च महीने में तालाब में बीज डाला जाता है और अप्रैल में झींगा तैयार हो जाती है. इसके बाद, दूसरा उत्पादन जुलाई से नवंबर तक लिया जाता है. एक कल्चर के दौरान करीब 7 टन झींगा मछली का उत्पादन हो जाता है. इसमें मेहनत और सही देखभाल की बहुत जरूरत होती है. पानी की गुणवत्ता, आहार और समय- समय पर जांच बेहद जरूरी है.

















