रामपुरा हाउस राव इंद्रजीत सिंह एक बार फिर चर्चा मे आ गए हैं उसकी बेटी स्वास्थ्य मंत्री आरती रावसरोगेट मदर बन गई है। इसी का लेकर पूरे हरियाणा में यह बात चर्चा बनी हुई हैंं। यहां जानिए सरोगेसी क्या है? इसके नियम व खर्चा कितना आता है।Surrogacy
सरोगेसी क्या है? सरोगेसी (Surrogacy) एक ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें एक महिला किसी अन्य दंपत्ति के लिए गर्भधारण करती है और बच्चे को जन्म देती है। इसे आम बोलचाल में “किराए की कोख” भी कहा जाता है। सरोगेसी कौन करा सकता है, इसका सरल उत्तर यह है कि यह उन दंपत्तियों के लिए एक समाधान है जो किसी कारणवश स्वयं गर्भधारण नहीं कर सकते।
Surrogacy – जब कोई महिला किसी और के लिए बच्चा जन्म देती है।अगर यह प्रक्रिया IVF (In-Vitro Fertilization) के ज़रिए की जाती है, तो इसे IVF Surrogacy कहा जाता है। इसमें माता-पिता के अंडाणु और शुक्राणु से भ्रूण बनाकर सरोगेट माँ के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है।
आज के समय में सरोगेसी उन परिवारों के लिए आशा की किरण बन गई है जो प्राकृतिक रूप से संतान सुख से वंचित रह जाते हैं। यही वजह है कि सरोगेसी क्यों कराई जाती है, यह समझना बेहद ज़रूरी हो गया है।
सरोगेसी का मल्टी-भाषाई अर्थ (Surrogacy Meaning in Indian Languages)
भारत एक बहुभाषी देश है, और जब बात चिकित्सा प्रक्रियाओं की होती है, तो अलग-अलग राज्यों में एक ही शब्द के लिए अलग-अलग शब्दावली और परिभाषाएं देखने को मिलती हैं। सरोगेसी (Surrogacy) जैसी जटिल प्रक्रिया को आम लोग तब और आसानी से समझ पाते हैं जब यह उनकी स्थानीय भाषा में समझाई जाती है।
सरोगेसी के प्रकार: जेस्टेशनल और ट्रेडिशनल
सरोगेसी के प्रकार मुख्य रूप से दो होते हैं – ट्रेडिशनल सरोगेसी और जेस्टेशनल सरोगेसी। दोनों ही प्रकार में सरोगेट माँ की भूमिका होती है, लेकिन जैविक (genetic) संबंध (खून का रिश्ता) और चिकित्सा प्रक्रिया में अंतर होता है।
ट्रेडिशनल सरोगेसी (Traditional Surrogacy in Hindi)
इस प्रकार की सरोगेसी में सरोगेट मदर का अंडाणु प्रयोग किया जाता है। इसमें पिता का शुक्राणु सरोगेट माँ के अंडाणु से निषेचित किया जाता है, जिससे बच्चे का जैविक संबंध यानी खून का रिश्ता सरोगेट माँ से भी होता है। इस प्रक्रिया में IVF की बजाय IUI (Intrauterine Insemination) तकनीक भी प्रयोग की जा सकती है।
जेस्टेशनल सरोगेसी (Gestational Surrogacy in Hindi)
जेस्टेशनल सरोगेसी को आज के समय में सबसे अधिक अपनाया जा रहा है। इसमें माता-पिता के अंडाणु और शुक्राणु से भ्रूण तैयार किया जाता है, और उस भ्रूण को सरोगेट माँ के गर्भाशय में प्रत्यारोपित (implant) किया जाता है। इस प्रक्रिया को ही आमतौर पर IVF Surrogacy कहा जाता है।
जेस्टेशनल प्रकार की सरोगेसी में बच्चे का सरोगेट माँ से कोई जैविक संबंध यानी खून का रिश्ता नहीं होता। वह केवल बच्चे को जन्म देने वाली माध्यम होती है। जहां ट्रेडिशनल सरोगेसी अब कम अपनाई जाती है, वहीं IVF आधारित जेस्टेशनल सरोगेसी आज के आधुनिक चिकित्सा परिदृश्य में अधिक सुरक्षित और स्वीकार्य मानी जाती है।
सरोगेसी क्यों कराई जाती है?
सरोगेसी क्यों कराई जाती है? सरोगेसी उन परिस्थितियों में कराई जाती है जब कोई महिला स्वयं गर्भधारण करने में असमर्थ होती है या गर्भावस्था उसके लिए स्वास्थ्य के लिहाज़ से खतरनाक हो सकती है। यह विकल्प मुख्य रूप से निम्न कारणों से चुना जाता है:
- गर्भाशय न होना या जन्म से ही अनुपस्थित होना
- बार-बार गर्भपात होना
- हॉर्मोनल या अनुवांशिक समस्याएं
- कैंसर जैसी बीमारी में गर्भाशय निकाल दिया जाना
- हाई-रिस्क प्रेगनेंसी के कारण डॉक्टरों की सलाह
सरोगेसी कौन करा सकता है?
भारत में सरोगेसी कराने की अनुमति सिर्फ भारतीय नागरिकों को है। इसके अलावा कुछ शर्तें भी पूरी करनी होती हैं:
- केवल विवाहित दंपत्ति (स्त्री और पुरुष)
- शादी को कम से कम 5 साल हो चुके हों
- दोनों में से किसी एक को चिकित्सकीय रूप से संतान उत्पन्न करने में असमर्थ होना चाहिए
- महिला की उम्र 23–50 वर्ष और पुरुष की 26–55 वर्ष होनी चाहिए
सरोगेसी कब कराई जाती है? सरोगेट मदर कौन होती है?
जब डॉक्टर यह तय करें कि प्राकृतिक गर्भधारण असंभव या खतरनाक है, तब ही सरोगेसी की सिफारिश की जाती है। यह अंतिम विकल्प के रूप में तब अपनाया जाता है जब सभी सामान्य उपचार और विकल्प फेल हो चुके हों।
सरोगेट मदर कौन होती है? सरोगेट मदर वह महिला होती है जो किसी अन्य दंपत्ति के लिए गर्भधारण करती है और बच्चे को जन्म देती है। जेस्टेशनल सरोगेसी में सरोगेट माँ का बच्चे से कोई जैविक (genetic) संबंध नहीं होता, लेकिन वह पूर्ण गर्भावस्था की जिम्मेदारी निभाती है। सरोगेट माँ बनने के लिए भी कुछ कानूनी और स्वास्थ्य से जुड़ी शर्तें होती हैं
- उसका खुद का एक बच्चा होना चाहिए
- उम्र 25–35 वर्ष के बीच हो
- मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ हो
- केवल परिवार के भीतर ही सरोगेसी की अनुमति (सरोगेसी बिल 2019 के अनुसार)
इस प्रकार सरोगेट माँ की भूमिका एक मानवीय सेवा की तरह होती है, जो किसी अन्य परिवार को माता-पिता बनने का अवसर देती है।
सरोगेसी का खर्च कितना होता है? (Cost of Surrogacy in Hindi)
सरोगेसी का खर्च कितना होता है – यह सवाल उन सभी दंपत्तियों के मन में आता है जो इस विकल्प पर विचार कर रहे हैं। भारत में सरोगेसी की प्रक्रिया में कई चरण होते हैं, जिनमें IVF प्रक्रिया, मेडिकल जांच, दवाइयाँ, सरोगेट मदर की देखभाल, कानूनी दस्तावेज़ और अस्पताल का खर्च शामिल होता है।
भारत में सरोगेसी का औसत खर्च:
भारत में IVF सरोगेसी (IVF surrogacy) की कुल लागत आमतौर पर ₹10 लाख से ₹20 लाख के बीच होती है। हालांकि यह राशि कई बातों पर निर्भर करती है। किन बातों पर सरोगेसी की लागत निर्भर करती है:
IVF साइकल्स की संख्या – अगर एक बार में सफल न हो तो लागत बढ़ सकती है
सरोगेट मदर की मेडिकल स्थिति और देखभाल
क्लिनिक या अस्पताल की प्रतिष्ठा और स्थान
कानूनी सलाह और दस्तावेजी प्रक्रिया की फीस
गर्भावस्था के दौरान विशेष देखरेख या जटिलता
इसके अलावा, कुछ प्रतिष्ठित क्लिनिक पैकेज फॉर्मेट में सरोगेसी सेवाएं भी देते हैं जिसमें सभी सेवाएं शामिल होती हैं। ध्यान दें कि भारत में कमर्शियल सरोगेसी पर प्रतिबंध है, इसलिए केवल परोपकारी (altruistic) सरोगेसी की अनुमति है – जिसका अर्थ है कि सरोगेट माँ को सिर्फ चिकित्सीय और देखभाल संबंधित खर्च दिया जा सकता है, अतिरिक्त आर्थिक लाभ नहीं।
IVF आधारित सरोगेसी की कीमत दंपत्ति की स्थिति, क्लिनिक के स्तर और गर्भावस्था की जटिलता के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। सही जानकारी और पारदर्शिता के लिए प्रमाणित और कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त क्लिनिक से ही संपर्क करें।
सरोगेसी के फायदे और नुकसान
जब कोई दंपत्ति संतान की चाह में सरोगेसी का विकल्प चुनता है, तो यह उनके लिए एक भावनात्मक और सामाजिक रूप से बहुत बड़ा फैसला होता है। इसलिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि सरोगेसी के फायदे और नुकसान क्या हो सकते हैं।
सरोगेसी के फायदे क्या हैं:
माता-पिता बनने का अवसर: जिन दंपत्तियों के लिए गर्भधारण असंभव है, उनके लिए यह प्रक्रिया संतान प्राप्ति की उम्मीद जगाती है।
जेनेटिक संबंध संभव: जेस्टेशनल सरोगेसी में माता-पिता के अंडाणु और शुक्राणु का उपयोग होता है, जिससे बच्चे के साथ जैविक (genetic) संबंध बना रहता है।
अन्य विकल्पों की तुलना में सफलता दर अधिक: IVF तकनीक और अनुभवी क्लिनिक की मदद से सरोगेसी के ज़रिए संतान प्राप्ति की संभावना अधिक होती है।
समय की बचत: उम्रदराज या व्यस्त दंपत्ति जिनके लिए गर्भावस्था संभालना कठिन हो, उनके लिए सरोगेसी एक तेज़ और सुरक्षित रास्ता हो सकता है।
सरोगेसी के नुकसान क्या हैं:
कानूनी जटिलताएं: सरोगेसी से जुड़ा कानून (जैसे सरोगेसी बिल 2019) काफी सख्त है। सभी नियमों और शर्तों को पूरा करना ज़रूरी होता है, जिससे प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है।
भावनात्मक तनाव: सरोगेट माँ और इच्छुक माता-पिता दोनों के लिए यह एक भावनात्मक रूप से संवेदनशील प्रक्रिया होती है। भावनाओं में उलझाव या जुड़ाव समस्या पैदा कर सकता है।
स्वास्थ्य संबंधी जोखिम: सरोगेट माँ के लिए गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य संबंधी खतरे हो सकते हैं, खासकर अगर मेडिकल निगरानी पर्याप्त न हो।
सरोगेसी बिल 2019 क्या है? और भारत में कानूनी स्थिति
सरोगेसी बिल 2019 क्या है? यह सवाल उन सभी लोगों के लिए अहम है जो भारत में सरोगेसी के कानूनी पक्ष को समझना चाहते हैं। भारत सरकार ने सरोगेसी की प्रक्रिया को नियंत्रित करने और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए “सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल 2019” संसद में पेश किया था। इसे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने लोकसभा में प्रस्तुत किया था।
इस बिल के अनुसार भारत में अब केवल परोपकारी सरोगेसी (Altruistic Surrogacy) की अनुमति है, जिसमें सरोगेट माँ को कोई आर्थिक लाभ नहीं दिया जाता, केवल गर्भावस्था से जुड़े चिकित्सा और देखभाल संबंधी खर्च ही दिए जा सकते हैं।
सरोगेसी बिल 2019 के प्रमुख प्रावधान:
भारत में व्यावसायिक सरोगेसी (Commercial Surrogacy) पूरी तरह बैन कर दी गई है।
सरोगेसी की अनुमति केवल भारतीय विवाहित संतानहीन दंपत्तियों को दी जाएगी।
दंपत्ति को कम से कम 5 साल से विवाहित होना चाहिए।
एक नेशनल सरोगेसी बोर्ड, स्टेट सरोगेसी बोर्ड और जिला स्तर पर निगरानी समितियों का गठन किया जाएगा।
कोई भी सरोगेसी केस बोर्ड की स्वीकृति के बिना शुरू नहीं हो सकता।
सरोगेट माँ केवल परिवार की कोई महिला हो सकती है, जो पहले से एक स्वस्थ संतान की माँ हो।
क्या भारत में सरोगेसी बैन है? नहीं, भारत में सरोगेसी पूरी तरह बैन नहीं है, अब केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति है लेकिन व्यावसायिक सरोगेसी (Commercial Surrogacy) पूरी तरह बैन कर दी गई है। विदेशी नागरिकों, समलैंगिक कपल्स, लिव-इन पार्टनर्स और अकेले पुरुष/महिला के लिए सरोगेसी पर प्रतिबंध है।
सरोगेसी बिल 2019 ने भारत में इस प्रक्रिया को कानूनी ढांचे के तहत नियंत्रित किया है। इसका उद्देश्य महिला सुरक्षा, पारिवारिक मूल्यों की रक्षा और सरोगेसी के व्यावसायिक शोषण को रोकना है।
सरोगेसी से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अधिकांश क्लिनिक सरोगेसी प्रक्रिया को गोपनीय रखने की पूरी कोशिश करते हैं। मरीजों की पहचान, सरोगेट माँ की जानकारी और कानूनी समझौते पूर्ण रूप से प्राइवेट रखे जाते हैं। हालांकि, कुछ मामलों में कानूनी आवश्यकताओं के चलते जानकारी साझा करनी पड़ सकती है।
सरोगेसी प्रक्रिया कितने समय तक चलती है?
सरोगेसी की पूरी प्रक्रिया में आमतौर पर 12 से 18 महीने लगते हैं। इसमें सरोगेट माँ की तलाश, मेडिकल जांच, कानूनी दस्तावेज़ीकरण, IVF प्रक्रिया, गर्भावस्था और डिलीवरी तक का समय शामिल होता है। अगर IVF पहली बार में सफल नहीं होता तो यह समय और बढ़ सकता है।
क्या एक ही दंपत्ति एक से अधिक बार सरोगेसी करा सकते हैं?
सरकार ने सरोगेसी के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियम बनाए हैं, जिसमें केवल एक बार सरोगेसी कराने की अनुमति दी जाती है – और वो भी चिकित्सा आवश्यकता साबित होने पर। इस पर निर्णय नेशनल या स्टेट सरोगेसी बोर्ड द्वारा लिया जाता है।
क्या सरोगेसी कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है?
यदि सरोगेसी बिना सरकारी बोर्ड की अनुमति या बिना कानूनी दस्तावेज के की जाती है, तो उसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। इसलिए किसी भी प्रकार की विवाद से बचने के लिए सरोगेसी हमेशा कानूनी प्रक्रिया और गाइडलाइंस के अनुसार ही करानी चाहिए।
क्या सरोगेसी में बच्चे की जन्म सामान्य होती है या ऑपरेशन से?
यह पूरी तरह सरोगेट माँ की शारीरिक स्थिति और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर करता है। अगर कोई जटिलता न हो तो सामान्य प्रसव कराया जा सकता है, लेकिन अक्सर IVF से जुड़े मामलों में डॉक्टर्स सुरक्षित ऑपरेशन (C-section) का विकल्प चुनते हैं।
सरोगेसी के लिए दंपत्ति को कौन-कौन से टेस्ट करवाने होते हैं?
सरोगेसी शुरू करने से पहले दंपत्ति को कई मेडिकल जांच करवानी होती हैं, जैसे कि HIV, Hepatitis B & C, थायरॉइड, ब्लड शुगर, हार्मोन प्रोफाइल, स्पर्म एनालिसिस और महिला की ओवरी की स्थिति जानने के लिए AMH टेस्ट। इसके साथ मानसिक स्वास्थ्य का भी मूल्यांकन किया जाता है।
सरोगेसी में सरोगेट माँ को क्या मेडिकल सुविधा दी जाती है?
सरोगेट माँ को पूरे गर्भकाल के दौरान मेडिकल निगरानी, पोषण, दवाइयाँ, मानसिक परामर्श और डिलीवरी के बाद रिकवरी की सुविधा दी जाती है। क्लिनिक या इच्छुक माता-पिता इस बात के लिए उत्तरदायी होते हैं कि उसे किसी प्रकार की असुविधा न हो।

















