Haryana News: रेवाड़ी। इंदौर में दूषित पानी पीने के बाद हुई मौतों के बाद पानी की शुद्धता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन ये समस्या मध्य प्रदेश की ही नहीं हरियाणा के जिला रेवाड़ी में ये समस्या है। सवाल यह है प्रशासन मौत होने का इंतजार रहा है। रेवाड़ी जिले के बावल व धारूहेड़ा के 16 गांव ऐसे हैं, जहां का भूजल दूषित हो चुका है। यहां का पानी पीने योग्य तो छोड़ो नहाने के लायक भी नहीं है। सबसे अहम बात यह है प्रशासन को सब कुछ पता होने पर कंपनी संचालको से दोस्ती निभाकर जेब भर रहा है।
एक लाख लोगो का जीना मुहाल: बता दे कि इंदोंर में हुए मौतो के बाद जब औद्योगिक कस्बा बावल और धारूहेड़ा के गांव खलियावास, भटसाना, निखरी, खरखड़ा, बनीपुर, सुठानी, जलियावास सहित 10 से ज्यादा गांवों की पड़ताल की, जिसमें चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि दूषित पानी की वजह से इन गांवों में पेट में संक्रमण और कैंसर जैसी घातक बीमारी के रोगी बढ़े हैं। दूषित पानी से इन गांवों में रहने वाली एक लाख से ज्यादा की आबादी सीधे प्रभावित है। Haryana News
धारूहेड़ा में हालत गंभीर: बता दे कि फैक्ट्रियों से निकलने वाला रसायन युक्त पानी साहबी बराज के रास्ते आसपास के गांवों में खेतों के रास्ते पहुंच चुका है। जिसकी वजह से भूजल जहरीला हो गया है। 500 एकड़ से ज्यादा भूमि बंजर होने के कगार पर है।
नई समस्या नहीं है: बता दे ये समस्या कोई नई नहीं है। साहबी के आसपास के करीब 10 गांवों में दूषित पानी की समस्या करीब 12 साल और बावल में फैक्ट्रियों के साथ लगते गांवों में यह समस्या करीब 9 साल पुरानी है। हालांकि साहबी बराज में छोड़े जाने वाले रसायन युक्त दूषित पानी का मामला तो तीन सालों से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चल रहा है। एनजीटी के आदेश पर ही तीन साल में अलग-अलग लैब से छह बार यहां के पानी की सैंपलिंग हो चुकी है। हर बार सैंपल फेल मिले हैं।
इस मामले को पहली बार वर्ष 2020 में हरियाणा प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के अलावा केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के समक्ष उठाया था। लेकिन कार्रवाई नहीं होने पर प्रकाश यादव ने वर्ष 2022 में एनजीटी कोर्ट का सहारा लिया। जिसके बाद हरकत में आए प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने जनस्वास्थ्य विभाग पर करीब पांच करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था। प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने माना था कि रेवाड़ी शहर के अलावा धारूहेड़ा व बावल की एसटीपी से बिना ट्रीट किए ही पानी साहबी बराज में छोड़ा जाता है। दूषित पानी का यह मामला हाल में भी एनजीटी में पेंडिंग है। Haryana News
| क्षेत्र | प्रभावित गांव |
|---|---|
| बावल क्षेत्र | आसलवास |
| पातुहेड़ा | |
| ड्योढई | |
| बनीपुर | |
| सुठानी | |
| जलियावास | |
| इब्राहिमपुर | |
| धारूहेड़ा क्षेत्र (बावल से सटा) | |
| धारूहेड़ा क्षेत्र | खरखड़ा |
| ततारपुर खालसा | |
| भटसाना | |
| निखरी | |
| खलियावास | |
| तीतरपुर | |
| मसानी | |
| सुनारिया |
इस मामले को पहली बार वर्ष 2020 में हरियाणा प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के अलावा केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के समक्ष उठाया था। लेकिन कार्रवाई नहीं होने पर वर्ष 2022 में एनजीटी कोर्ट (NGT) का सहारा लिया। जिसके बाद हरकत में आए प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने जनस्वास्थ्य विभाग पर करीब पांच करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था। प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने माना था कि रेवाड़ी शहर के अलावा धारूहेड़ा व बावल की एसटीपी से बिना ट्रीट किए ही पानी साहबी बराज में छोड़ा जाता है। दूषित पानी का यह मामला हाल में भी एनजीटी में पेंडिंग है।

बढता जा रहा पानी, प्रशासन दिखा रहा झूठी रिपोर्ट: हालांकि एनजीटी की कार्रवाई को लेकर रेवाड़ी प्रशासन को इसको लेकर कार्रवाई करते आदेश भी दिए लेकिन हुआ क्या.. जिस कर्मचारी ने इन विभागों पर जुर्माना लगाया था उसका यहीं से तबादला कर दिया। न तो एटीपी पर लगाया गया जुर्माना भरा गया है तथा नही कोई कार्रवाई हो रही है। सिर्फ कागजों में पानी की सही दिखाकर जनता का मीठा जहर दे रहे है।
गांवों में फैल रही बीमारियां, घट रही उर्वरता
रिपोर्ट के मुताबिक, साहिबी नदी में छोड़ा गया प्रदूषित जल, सीवरेज और औद्योगिक अपशिष्ट का ज़हर कई जगह आस-पास के गांवों तक फैल गया है। खासकर खरखड़ा, मसानी, भटसाना, ततारपुर खालसा, खलियावास, तितरपुर, जीतपुरा, आलावलपुर, जड़थल, खिजुरी, धारूहेड़ा आदि का भूजल नदी के रसायनिक प्रदूषण वाले दूषित जल के कारण ज़हरीला होता जा रहा है।
खतरनाक रासायनिक प्रदूषण वाला नदी का दूषित जल इन गांवों के भूजल से मिलकर लोगों में तरह-तरह की बीमारियां और स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर रहा है। लोगों को त्वचा एवं श्वसन संबंधी बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। इन क्षेत्रों में टीडीएस, फ्लोराइड, आयरन और मैग्नीशियम की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंचने के कारण खेती की जमीन की उर्वरता घट रही है और किसानों के मवेशी बीमार पड़ रहे हैं।
ज़मीन की उर्वरता घटने और उसमें रसायनों के जमाव के चलते इन इलाकों में अब खेती केवल गेहूं और बाजरा की कुछ प्रतिरोधक किस्मों तक सीमित हो गई है। पारंपरिक रूप से सर्दियों में नदी किनारे गीली मिट्टी में उगाया जाने वाला चना अब नदी के सूखने के कारण पनप नहीं पा रहा है। इस तरह साहिबी नदी के प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है।
दूषित पानी की समस्या को लेकर 219 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट बन चुका है। जिसका कार्य सिंचाई विभाग को करना है। पहले चरण में 125 करोड़ रुपये की लागत से साहबी बराज पर पंप हाउस बनाया जाएगा। यहां के पानी को रिफिलिंग किया जाएगा। इसके बाद लाइन बिछाकर इस पानी को ड्रेन नंबर आठ में छोड़ा जाएगा। तीन विभाग आपस में मिलकर प्रोजेक्ट की कुल राशि का वहन करेंगे। राशि जारी करने के लिए जनस्वास्थ्य विभाग और एचएसआइआइडीसी को पत्र लिखा जा चुका है।
-वीके बाघोतिया, एक्सइएन, सिंचाई विभाग।

















