Fake Insurance Policy: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (NIC) के अध्यक्ष और मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) को एक आपराधिक मामले में आरोपी बनाया जाएगा। कंपनी पर आरोप है कि वह मोटर दुर्घटना के मामले में फेक इंश्योरेंस पॉलिसी पर निर्भर थी कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए भी एक विशेष जांच टीम (SIT) बनाने का भी आदेश दिया।
नेशनल इंश्योरेंस कंपनी को कल गुरुवार को जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि इंश्योरेंस पॉलिसी के फेक होने के बाद भी कोई आपराधिक मामला नहीं दर्ज किया गया। कोर्ट ने कंपनी की लापरवाही को भी जिम्मेदारी की घोर कमी बताया।
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा अब वह समय आ गया है जब इस कोर्ट को कुछ कड़े कदम उठाने होंगे ताकि इंश्योरेंस कंपनियां अपनी जिम्मेदारी और सतर्कता का पालन करें क्योंकि वे आखिरकार आम जनता से जुड़े खजाने से धन दे रहे हैं साथ ही कोर्ट ने इस मामले को राष्ट्रीय महत्व का एक टेस्ट केस बताया।
बाद में कोर्ट ने SIT को मामले की जांच सौंपने का आदेश दिया जिससे NIC के CMD और स्थानीय ब्रांच मैनेजर सहित अन्य कर्मचारियों को भी आरोपी बनाया जाए। बस मालिक जिसकी इंश्योरेंस पॉलिसी की जांच चल रही है भी मोटर दुर्घटना मामले में आरोपी बनाया जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि जांच टीम को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि केस को पूरी तरह से गंभीरता से लेकर जल्द से जल्द ठोस निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए। कोर्ट ने कहा कि जांच का मुख्य लक्ष्य नकली और मनगढ़ंत इंश्योरेंस रिकॉर्ड बनाने के आरोपों की जांच करना चाहिए।
पहले कोर्ट ने तमिलनाडु के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) को निजी तौर पर इस मामले में पेश होने का आदेश दिया था साथ ही डीजीपी से एक हलफनामे में स्पष्टीकरण की मांग की गई थी जिसमें सुझाव दिया गया था कि मोटर दुर्घटनाओं से जुड़े मामलों में पुलिस को इंश्योरेंस दस्तावेजों की वैधता की जांच करना आवश्यक नहीं है इस दृष्टिकोण पर कोर्ट ने बहुत आपत्ति जताई थी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद डीजीपी कल कोर्ट में पेश हुए और बिना शर्त माफी मांगी जिसे बेंच ने माना। देश की सर्वोच्च अदालत उन आरोपों की जांच कर रही है कि एक मोटर दुर्घटना मुआवज़ा मामले में फेक इंश्योरेंस पॉलिसी पर भरोसा किया गया था।
K. Sarvanan, एक सड़क दुर्घटना में घायल हुआ था। उसे गंभीर रूप से घायल होने के कारण अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी और उसे कई सर्जरी और लंबी अवधि की चिकित्सा से गुजरना पड़ा बाद में उसने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के समक्ष एक दावा याचिका दायर की जिसमें उसने बस के मालिक और उसके बीमाकर्ता NIC से मुआवजे की मांग की।
इंश्योरेंस कंपनी ने MACT के समक्ष पूरे दावे को नकार दिया था। उसने कहा कि दावा करने वाले व्यक्ति की इंश्योरेंस पॉलिसी यानी सिर्फ मालिक की थर्ड पार्टी इंश्योरेंस पॉलिसी वैध नहीं थी। हालाँकि MACT ने बीमाकर्ताओं के बचावों को खारिज कर दिया और NIC को जिम्मेदार ठहराया।
मद्रास हाईकोर्ट ने भी MACT के फैसले को बरकरार रखा बीमाकर्ता की पॉलिसी संबंधी चुनौती को खारिज कर दिया और मुआवजे की रकम में संशोधन कर दिया जब मामला पहुंचा इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

















