Loan Defaulter Action: बैंकों से मोटे-मोटे लोन लेकर उन्हें न चुकाने वालों के लिए बुरे दिन शुरू होने वाले हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि बड़े कर्ज डिफॉल्टर्स के खिलाफ नए सिरे से आपराधिक कार्रवाई शुरू की जा सकती है। अब तक कई हाईकोर्ट के आदेशों के चलते ऐसे डिफॉल्टर्स पर कार्यवाही रुकी हुई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी आदेशों को रद्द कर दिया है, जिससे बैंक और जांच एजेंसियां अब पूरी ताकत के साथ इनके खिलाफ कार्रवाई कर सकेंगी। Loan Defaulter Action
हाईकोर्ट की सीमाओं को किया खारिज सुप्रीम कोर्ट ने कहा न्यायिक दायरे से बाहर गए आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा कि देश के कई हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे आदेश जारी किए, जिनमें डिफॉल्टर्स के खिलाफ दर्ज FIR और आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज करना और आपराधिक जांच करना पूरी तरह कानून के दायरे में आता है।
सिर्फ इसलिए कि बैंक ने किसी कर्जदार को फ्रॉड घोषित किया है या नहीं किया है, इससे आपराधिक जांच पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक और आपराधिक कार्यवाहियों की प्रकृति और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं।
अब बैंक फ्रॉड के मामलों में दर्ज होंगी FIR नहीं रुकेगी कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यदि कोई बैंक यह पाता है कि किसी ने जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाया है या फ्रॉड किया है, तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
RBI और बैंकों द्वारा जो फ्रॉड डिक्लेरेशन होती है, वह प्रशासनिक प्रकिया है।
लेकिन आपराधिक कार्यवाही जैसे FIR, जांच और चार्जशीट, अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत चलती है।
अब इन दोनों को आपस में मिलाकर नहीं देखा जाएगा। Loan Defaulter Action
इसका सीधा मतलब है कि अगर बैंकिंग स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं भी हुई हो, तब भी पुलिस या एजेंसियां कानून के तहत अपराध की जांच कर सकती हैं।
समान तथ्यों पर भी हो सकती है अलग-अलग कार्रवाई
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अगर किसी मामले के तथ्य एक जैसे हैं, तो भी प्रशासनिक स्तर पर भले ही कोई कार्रवाई न हुई हो, लेकिन आपराधिक कार्रवाई रोकी नहीं जा सकती।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का लोन डिफॉल्ट बैंक द्वारा फ्रॉड न भी घोषित किया गया हो, लेकिन यदि उसके खिलाफ धोखाधड़ी के पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो पुलिस FIR दर्ज कर सकती है।
कोर्ट ने दोहराया कि प्रशासनिक और आपराधिक कार्रवाई का मकसद और तरीका अलग-अलग होता है।
यह टिप्पणी विशेष रूप से उन डिफॉल्टर्स के लिए बड़ा झटका है जो अब तक बैंकिंग सिस्टम के तकनीकी झोल का फायदा उठा रहे थे।
बैंकों को मिली बड़ी राहत जांच एजेंसियों का बढ़ेगा हौसला
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बैंकों को भी बड़ी राहत मिली है।
अब वे बेझिझक बड़े डिफॉल्टर्स के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
जांच एजेंसियां बिना किसी न्यायिक रोक के अपनी कार्रवाई आगे बढ़ा सकेंगी।
इससे बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता आएगी और कर्ज वसूली में तेजी आएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जानबूझकर लोन न चुकाने वालों पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनेगा, जो भविष्य में डिफॉल्ट की घटनाओं को कम कर सकता है।
कौन से डिफॉल्टर्स होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित ?
इस फैसले का सीधा असर उन डिफॉल्टर्स पर पड़ेगा:
जिन्होंने बड़ी रकम का लोन लिया और जानबूझकर उसे नहीं चुकाया।
जिनके खिलाफ बैंकों ने पहले फ्रॉड की रिपोर्ट तैयार की थी लेकिन कानूनी अड़चनों के चलते कार्रवाई नहीं हो पाई थी।
जो अदालतों का सहारा लेकर आपराधिक कार्यवाही से बचते रहे हैं।
अब इनके खिलाफ पुलिस, CBI, ED जैसी एजेंसियां स्वतंत्र रूप से कदम उठा सकती हैं।
लोन लेने वालों के लिए जरूरी चेतावनी
जो लोग बैंक से लोन लेते हैं, उनके लिए अब सतर्क रहने का समय है।
जानबूझकर लोन न चुकाने पर केवल सिविल रिकवरी ही नहीं, बल्कि आपराधिक मामला भी दर्ज हो सकता है।
फ्रॉड या जालसाजी के मामलों में जेल तक की नौबत आ सकती है।
क्रेडिट स्कोर खराब होना तो तय है ही, साथ ही अन्य कानूनी परेशानियां भी झेलनी पड़ सकती हैं।
इसलिए लोन लेते समय और उसके भुगतान में पूरी ईमानदारी बरतनी जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बढ़ेगी बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के लिए एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट है।
इससे बैंकों का विश्वास बहाल होगा।
ईमानदार कर्जदारों और फ्रॉड करने वालों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा।
कर्ज लेकर पैसे डकारने की आदत पर लगाम लगेगी। Loan Defaulter Action

















